#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १४४ - दि. १५.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १४४: दि. १५.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
आत्मा के पंचकोशों पर विचार के समय मैं सोचती रही की यह मेरे लिए कैसे उपयुक्त हो सकता हैं ?
गुरुमंत्र मैंने लिया नहीं हैं ..
साधना मैं करती नहीं हूँ ..
मन में भक्ति - श्रद्धा है परंतु ज्ञान की अनेक बातें पढने - सुनने के पश्चात भी भौतिक जीवन के दुख और समस्याओं का क्या करना हैं यह समझ ही नहीं आता हैं ..
अभी भी अन्न का स्वाद, आरामदायी बिछौना, आरामदायक कपडे इनमें मन अटका पड़ा हैं ..
साधारण ७५ वर्ष का जीवनकाल माने तो आयु के अंतिम पडाव में कब का प्रवेश कर चुकी हूँ, फिर भी मन में क्रोध - ईर्ष्या - इच्छाएँ इनकी धूल जमीं हुई है ..
तो क्या करूं मैं इन पंचकोशों पर विचार कर ?
प्रत्येक व्यक्ति के मन में दो व्यक्तित्व होते हैं। एक वह होता हैं जो निरंतर सुबुद्धी के स्तर पर विचार करता है, अपनी सद्य अवस्था से उँचा उठकर जीवन के आदर्शों को अपनाना चाहता है, जो स्वयं से विजयी होकर अपनी ही दृष्टी में उन्नत स्थान पाने की मनिषा रखता हैं !
और दूसरा व्यक्तित्व इस भौतिक जीवन को ही सत्य मानता है, रोजमर्रा की आपाधापी में इतना मगन हो जाता है कि उसके लिए अपने ही धर्म की गहरी, प्रगल्भ सीख समझने का ना समय बचता हैं ना इच्छा !
और धर्म की सीख का अर्थ विशिष्ट प्रकार की वेशभूषा करना, निर्दिष्ट समय पर विशिष्ट धार्मिक कर्म करना, व्रत - उपवास आदि तक सीमित नहीं है।
धर्म को जानने का अर्थ है धर्म के तत्वों को समझना और उनके अनुसार विचार और आचरण रखना ।
हम इसपर विचार करते रहेंगे ।
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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