#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३२ - दि. ०३.१०.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १३२: दि. ०३.१०.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩

सनातन हिंदु धर्म के संस्कारों के संदर्भ में एक ही विषय विभिन्न रुपों में उभरकर आ रहा हैं, धर्माचरण व अधर्माचरण।

इन की चर्चा अबतक हमने देवताओं, दिव्यपुरुषों और हमारे इतिहास के संदर्भ में की हैं।
प्रश्न यह हैं कि क्या आजकल के युग में यह विषय प्रासंगिक हैं ? इसकी कोई उपयोगिता भी हैं ?
अथवा यह सब मात्र आख्यान हैं जिन्हे भक्तिभाव से सुनकर देवताओं को प्रणाम करना यही उसका तात्पर्य हैं ?
क्योंकि यह सब तो त्रेतायुग, द्वापारयुग या उससे भी पहले कभी घटा था। तब की परिस्थितियों की तुलना वर्तमानकाल से कैसे करेंगे ?
सबकुछ जब इतना बदल गया हैं, तब उन घटनाओं पर विचार कैसे अर्थपूर्ण होगा ?

और हम ना तो जरासंध हैं जो १०० राजाओं की बलि चढाने की इच्छा रखते है, ना हम नरकासुर हैं जो १६१०० राजकुमारियों को बंदी बनाएंगे, ना हम धृतराष्ट्र या दुर्योधन है जो दूसरे का राज्य हथिया लेंगे, ना हम कंस हैं जो पिता को कारागृह में रखकर स्वयं राजा बन बैठेंगे।
तो यह सब चर्चा हमारे लिए कैसे उपयुक्त होगी ?

सनातन हिंदु धर्म की विशेषता यह हैं कि यह धर्म परिवर्तनशील हैं अर्थात प्रथा, परंपरा व पद्धतियों (procedures) को बदलने की स्वतंत्रता देता है। किंतु धर्म के मूल तत्व प्रत्येक युग में और प्रत्येक परिस्थिती में अपरिवर्तनीय हैं, अनुल्लंघनीय हैं !

हम क्रमश: उनपर विचार करेंगे। हमारे जीवन की प्रत्येक स्थिती और पडाव के संदर्भ में हम चिंतन करें तो मार्ग अवश्य दिखाई देगा।

यह विषय कदाचित दीर्घ हो जाएं परंतु हम इस विश्वास के साथ आगे बढेंगे की हमारा धर्म ही हमारा कल्याण करेगा !

जरासंध अथवा नरकासुर ने अन्य मनुष्यों को बंदी इसलिए बनाया था क्योंकि वह स्वयं के लिए कोई फायदा चाहते थे। जरासंध को अजेय - चक्रवर्ती सम्राट बनना था और नरकासुर को उपभोग की लालसा थी। अर्थात दोनो ही अन्याय व शोषण कर रहे थे। हमें यह नहीं करना है !
कैसे ?
शोषण तब होता हैं जब हमारे पास अधिकार होता है। अपने कामकाज में, नौकरी में, हमारे घर में काम करनेवाले सहायकों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना, सम्मानजनक भाषा में बात करना, अति वृद्ध माता - पिता की उचित देखभाल करना (भले ही वह जिद्दी, चिढचिडे हुए हो, आपकी बात ना मानते हो फिर भी यह स्मरण रखना हैं कि उन्होने कभी आपको गोद में लेकर रातें काटी हैं, आपकी अबोध असहाय्य शिशु अवस्था में आपका मल - मूत्र धोया हैं !)  आदि भी धर्माचरण का भाग है।

जो वस्तू अथवा संपत्ति हमने अर्जित नहीं की है अथवा जिसपर हमारा विधिसंमत (lawful) अधिकार नहीं हैं उसका मोह ना रखना भी धर्माचरण ही हैं। 
जैसे  पदोन्नति पाने के लिए किसी और को नीचा दिखाकर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना, अपने माता - पिता की अथवा बन्धु - बहनों की संपत्ति हडप लेना यह अधर्माचरण हैं। उत्कोच ( Bribe = घूस) लेना अधर्माचरण हैं।  
कभी कभी खरीदारी के समय भूलवश दुकानदार कम पैसे का बिल बनाते हैं। ऐसे में हमारे ध्यान में बात आनेपर उचित रकम देनी चाहिए अन्यथा हम अधर्म के दोषी होंगे।
कोई व्यक्ती यदि हमें अप्रिय है तो उसके संबध में अपप्रचार करना भी अधर्माचरण है।

यह केवल उदाहरण है। विचार करनेपर हम सहजता से धर्म और अधर्म का अंतर समझकर अपने व्यवहार की गरिमा बनाए रख सकते है।
उसके लिए केवल धर्म में आस्था होनी चाहिए !

गर्व से कहे 👇🏼

हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳

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