#हिंदु-धर्मसंस्कार : भाग १३९- दि. १०.१०.२०२३
हिंदु धर्मसंस्कार
भाग १३९: दि. १०.१०.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
विज्ञान के अनुसार, वैद्यकशास्त्र के अनुसार मनुष्य की मानसिक स्थिति से उसका शरीर प्रभावित होता है।
अनेकों बार यह पाया जाता हैं कि केवल मनोविकार नहीं अपितु जो व्याधियाँ केवल शरीर से संबंधित हैं ऐसा हम सोचते हैं वह भी मानसिक तनाव, निराशा आदि भावनाओं के कारण बढती हैं। जैसे उच्च रक्तचाप, (High BP), हृदयरोग, मधुमेह, पीठदर्द/ कमरदर्द, मूत्राशय से संबधित व्याधि, गर्भधारण संबधी समस्याएँ आदि। क्योंकि मानसिक तनाव, चिंता, दुख प्रकृति पर प्रतिकूल परिणाम करते है। इनके कारण अनेक व्याधियाँ (disease) उत्पन्न होती हैं और व्याधियों की तीव्रता बढती भी है।
कर्करोग (Cancer) जैसे रोग के लिए चिकित्सकों द्वारा प्राय: बताया जाता है कि नियमित वैद्यकीय उपचारों के साथ ही रुग्ण व्यक्ति की व्याधिमुक्त होने की इच्छा व धैर्य अत्यंत आवश्यक हैं। अन्यथा उपचार प्रभावी नहीं होते हैं।
अब कर्करोग तो शरीर की पेशियों में उत्परिवर्तन (Mutation) के कारण होता हैं।
फिर उसके उपचार में मनःशक्ती की आवश्यकता कैसी ?
क्योंकि आत्मा का मनोमय कोश हमारी भावनाओं का स्त्रोत / निर्मितीस्थल हैं और इस कोश की स्थिति का शरीर के स्वास्थ पर परिणाम होता हैं। नकारात्मक भावनाओं के कारण शरीर के अंतःस्त्रावों का (Harmonal secretion) संतुलन बिगडता हैं। परिणामतः शरीर के अवयवों को कष्ट / व्याधि होती हैं।
इसी से स्पष्ट हैं कि शरीर और मन के संबध में सनातन हिंदु दर्शन और आधुनिक वैद्यकशास्त्र किस प्रकार एकमत हैं।
इसी कारण मनोमय कोश को सुदृढ करना अत्यावश्यक हैं।
इसका मार्ग है ध्यान करना (Meditation)। इससे मन का तनाव धीरे धीरे दूर होता हैं और मन शांत होने लगता है। और मन स्वस्थ होने से तन भी स्वस्थता प्राप्त करने की स्थिति में आता हैं।
ध्यान सरल नहीं हैं। लगातार चार - पाँच - छः घंटों तक मनुष्य काम कर सकता हैं, शरीर कष्ट कर सकता हैं किंतु १५ मिनट ध्यान करने का प्रयास करें तो वह कठिन हो जाता हैं। इसके लिए मार्गदर्शन भी चाहिए और सतत अभ्यास भी और फिर भी वह कठिन ही है !
किंतु शरीर हमारा, मन हमारा और मनोमय कोश से वेष्टित आत्मा भी हमारी ! तो स्व - उन्नयन के लिए कार्य का दायित्व भी हमारा ही हैं !
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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