#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १६२- दि. ०२.११.२०२३

हिंदु धर्मसंस्कार :
भाग १६२ - दि . ०२.११.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

हम प्रत्येक भाग में धर्म संबधी विचार करते है, धर्मपालन का मुद्दा अधोरेखित करते है और धर्माचरण को जीवन का उद्देश बताते है।
ऐसा क्या है हमारे सनातन हिंदु धर्म में जो हम इससे इतने अभिभूत हैं ?
अन्य धर्मों में ऐसा क्या नहीं है जो हमारे धर्म में हैं?

सर्वप्रथम हम यह निश्चित करेंगे की अन्य धर्मो में 'क्या नहीं हैं' यह ढूंढना इस लेखमाला का उद्देश नहीं है। 
लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता हैं कि वह निजी जीवन में किस धर्म का अनुयायी हो यह निर्णय ले सके। 
यदि वह किसी धर्म को ना मानना चाहे तो वह भी संभव है। इसलिए और लोग क्या, क्यों और कैसे करते है यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है।

हम सनातन हिंदु धर्म की अच्छाइयों पर विचार करेंगे। कारण यह हैं कि केवल विशिष्ट धर्म के मातापिता ने जन्म दिया है इसलिए धर्म का पालन करने से अच्छा हैं कि हम धर्म को समझकर उसका पालन करें !
Let this be an Informed Decision !

हम क्रमशः हमारे धर्म की अच्छाइयों पर विचार करेंगे।

सनातन हिंदु धर्म परिवर्तनशील है
प्राचीन हिंदु परंपराओं के अनुसार यज्ञयाग, अनुष्ठान, तपस्या, पूजाकर्म इ. आधुनिक युग में नहीं किया जाता है। परंतु इस कारण हमारे 'हिंदुत्व' को संशयित दृष्टी से नहीं देखा जाता है। दृश्य रुप से धार्मिक कृत्य ना करनेवाला व्यक्ति भी धार्मिक है ऐसा सनातन हिंदु धर्म मानता है। यद्यपि हम ३३ कोटी (= ३३ प्रकार) के देवताओं का वर्णन करते हैं किंतु वस्तुतः 'सर्व देव नमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति' यही हमारी मान्यता हैं।
इस संदर्भ में विस्तृत विचार दि . १४.०६.२०२३ के भाग २१ में हमने किया था।
परंतु यह एक ही जो परमोच्च शक्ती हैं उसके लिए भी पूजा / अनुष्ठान आदि का आडंबर अत्यावश्यक नहीं है। इस विषय पर हमने दि.१६.१०.२०२३ के भाग १४५ में विचार किया था। 

हम मानते है कि बिना किसी साधनसामग्री के, औरों को आभास ना होते हुए भी हम अत्यंत धार्मिक हो सकते हैं। पूज्य शारदामाताजी कहती थी कि जब हम ईश्वर का नाम लें तब हमारी जिव्हा भी नहीं हिलनी चाहिए। अर्थात शरीर के किसी अंग को भी यह ज्ञात ना हो कि हम ईश्वरभक्ति में लीन है। 
सारांश, हमारा धर्म कर्मकांड को अत्यावश्यक नहीं मानता है। इसलिए धार्मिक कर्म ना करनेवालों को धर्मद्रोही अथवा धर्मच्युत नहीं माना जाता है। आधुनिक युग में जीवन की द्रुत गति में प्राचीन काल के समान विशिष्ट समय पर विशिष्ट पूजा कर्म करने का बंधन अपनेआप शिथिल हो गया हैं, परंतु फिर भी हम सब सनातनी हिंदु बने हुए हैं।
क्यों ?
क्योंकि सनातनी हिंदु धर्म व्यक्ती को धर्मविचारों के बंधन में जकडता नहीं हैं, धर्म के बंधन व्यक्ती पर थोपता नहीं हैं और धर्म की सांकल हमारे जीवन के हर एक कोने को बांधकर हमारी सोच को आकुंचित नहीं करती है !

यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए समय और पूजाकर्म बताए गए हैं किंतु यदि वह संभवना हो तो कभी भी, कहीं भी, उठते - बैठते - सोते - जागते - खाते - पिते समय, यात्रा करते समय, अपने दैनिक काम करते समय यदि हम मन में ईश्वर का अधिष्ठान रखते हैं, उनका स्मरण - जाप करते है तब भी हम सनातनी हिंदु हीं है ❗

सनातनी हिंदु धर्म व्यक्ति को स्वतंत्र करता हैं और उस स्वतंत्रता को निभाने के लिए विचारों की सबल नींव (strong plinth) बनाता हैं।

गर्व से कहे 👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१३

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४८

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०२