#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १६५ - सोमवार दि . २०.११.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

वर्ष का दूसरा त्योहार हैं महाशिवरात्रि। वस्तुतः यह त्योहार नहीं, पर्व है। क्योंकि इसमें उत्सव, समारोह आदि नहीं होते हैं। महाशिवरात्रि का संबध भक्ती से है।

वर्ष में १२ शिवरात्रियाँ होती हैं यानि प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी। इनमें से फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी का दिन 'महाशिवरात्रि' के रूप में मनाया जाता है। मान्यता हैं कि यह शिव-पार्वती के विवाह का दिन है।

सनातन हिंदु धर्म की मान्यता है कि प्रकृति और पुरुष (= स्त्री व पुरुष) दोनो का सहअस्तित्व, सामिप्य, साहचर्य, सहयोग इनके साथ ही उनका एक दूसरे के प्रति सम्मान और समर्पण भावना विश्वकल्याण के लिए अनिवार्य है, इसलिए शिव और पार्वती के सहजीवन के प्रारंभ का यह दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है।

वैसे तो विवाह में उत्सव व समारोह का आयोजन होता है। किंतु सनातन हिंदु धर्म में विवाह धर्मकार्य माना गया है। इसलिए यह पर्व व्रत करने का है। इस दिन उपवास, मंदिर में 'महादेव' शिव को जलाभिषेक व दुग्धाभिषेक करना, महापूजा  करना आदि परंपराएँ पायी जाती है। विशेषतः रुद्र पूजा का इस दिन महत्व हैं।

क्यों हैं शिवपूजा का महत्व ?
शिवजी को आदिदेव कहा जाता है। वह योग परंपरा के आदि गुरु है। ध्यान की अवस्था की कल्पना करते ही सर्वप्रथम शिवजी की आकृति मन में उभरती है। शिवजी का सानिद्ध्य मन को शांत करता है। सत्पुरुषों के, संतो के संबध में बताया जाता हैं कि उनके (तेजो) वलय (Aura) के कारण उनके सहवास में मन को शांति मिलती हैं और मन में सद्‌विचारों का, पवित्र भावनाओं का उदय होता हैं इसका कारण उनका यह तेजोवलय हैं। 
इस के ठीक विपरित आसुरी, दुष्ट, हिंसक प्रवृत्ति के व्यक्ती के निकट आते ही साधारण व्यक्ती का मन भी अशांत होता है, भयव्याप्त होता है और मन में दूषित विचारों का उद्भव होता होता है। यह उन दुष्ट शक्तियों के वलय का प्रभाव होता है। उनके वलय का आकार असममित 
(= asymmetric) होता है और उसके किनारे खुरदरे होते हैं। 

परंतु संत , सत्पुरुषों के और दैवी शक्तियों के तेजावलय सुदीर्घ (= विशाल) , सममित आकार के (= symmetrical) होते है और उनके किनारे की रेखा हमवार (smooth) होती है। शिवलिंग इसी तेजोवलय का प्रतिक है।
 शिवलिंग को पुरुष जननेंद्रिय का प्रतिक मानना अज्ञान हैं अथवा विकृती है और अपप्रचार तो हैं ही!

शिवजी यह ध्यान्यस्थ योगी का सर्वोच्च पवित्र व महान उदाहरण है यह हम हिंदुओं को समझना चाहिए।

(रही बात योनि पूजा की तो यह भी अज्ञान का उदाहरण है। सनातन हिंदु धर्म स्त्री को पवित्र व पूजनीय स्थान अवश्य देता हैं। किंतु स्त्री का पूजन माता दुर्गा, महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली और अन्नपूर्णा के रूप में किया जाता हैं। पूजा के लिए स्त्री जननेंद्रीय की कल्पना अशोभनीय, बिभत्स व निंदनीय है। इस प्रकार की पूजाएँ अघोरपंथ में की जाती हैं किंतु यह वांछनीय, पवित्र, अनुकरणीय पद्धति नहीं हो सकती हैं, यह तो हमारे प्रिय धर्म का विकृतीकरण हैं ! )

इसलिए शिवपूजन के महान पर्व के रुप में मनाई जानेवाली महाशिवरात्री सनातन हिंदु धर्म के जिन मूल्यों की ओर इंगित करती हैं उसी से हमारे धर्म की महिमा स्वयंस्पष्ट हैं !

गर्व से कहे 👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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