#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १६८ - सोमवार दि . २७.११.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
गुढीपाडवा के पश्चात विविध प्रांतो में अनेक त्योहार, पर्व, पूजा इत्यादी का आयोजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त संत - सत्पुरुषों के प्रकटदिन / समाधिदिन के उपलक्ष्य में भी धर्मकार्य किए जाते है। इनमें से कुछ आयोजन सामूहिक रुप में तो कुछ वैयक्तिक अथवा कुटुंब के स्तर पर होते है।
किंतु सनातन हिंदु धर्म में धार्मिक आयोजनों का मुख्य काल है चातुर्मास !
इस काल में महापूजा, अभिषेक, याग ( होम / यज्ञ), लघुरुद्र - महारुद्र, विविध स्त्रोत्रों का सहस्त्रावर्तन, विशिष्ट देवता की एक लक्ष फूल - बेल - दूर्वा आदि से पूजा, विविध तिथियों को व्रत व उपवास आदि अनेक आयोजन किए जाते हैं।
इन सबका क्या महत्व हैं ?
क्यों यह आवश्यक हैं ?
मानवसमूह में स्खलनशील व्यक्तियों की संख्या लक्षणीय है। इसलिए मनुष्य की उर्जा, विचारशक्ती और व्यवहार को नियंत्रित करना आवश्यक हो जाता है। यह नियंत्रण भी ऐसा होना चाहिए जिससे व्यक्ती को वह अदृश्य बंधन कष्टकारक अथवा कैदसदृश ना लगे।
हमारे पूर्वजों ने कदाचित इसी विचार से हमारे धार्मिक उत्सवों की रचना की थी। उन्होने मानव की उत्सवप्रियता का विचार कर विविध धार्मिक समारोहों के आयोजन की विधि बनाई । इन उत्सवों में ईश्वरभक्ती भी हैं और मनुष्य के मन की गहराई में छिपा उत्साह और कुछ कुछ जंगली (wild) प्रेरणाओं के नियंत्रित प्रकटीकरण की व्यवस्था भी है जिससे की ऐसी भावनाएँ अनुशासनहीनता व स्वैराचार की सीमाओं की ओर बढने से बची रहे।
जैसे होलिकादहन के पश्चात रंगों का त्योहार है, गुजरात में नवरात्री में गरबा नृत्य की परंपरा है, दिवाली में पति - पत्नी, पिता - पुत्री, भाई - बहन के नाते के लिए दिन निश्चित है।
इस प्रकार कुटुंब - परिजन और सगेसंबधियों के साथ त्योहार मनाने से मनुष्य का मन प्रेमरज्जु से बंध जाता हैं और उसकी आदिम स्वैर प्रेरणाओं पर अंकुश रहता है।
इसके अतिरिक्त मनुष्य को सामाजिक ऋण का ध्यान दिलाने के लिए धर्मकार्यों में दान का महत्व बताया गया हैं, पूजा - धर्मकार्य करवानेवाले पुरोहित को दक्षिणा का भी प्रावधान है क्योंकि उन्होने ऐसे आयोजनों के लिए अनेक वर्षों तक विधिवत शिक्षा ली होती हैं और उन्हे इसका निरंतर अभ्यास व revision करना होता है। इसलिए उन्हे दक्षिणा देकर हम उपकार नहीं करते हैं, उल्टे आयोजन संपन्न कराने के लिए उन्हे कृतज्ञतापूर्वक मानदेय (Honorarium) देते हैं।
अन्य धर्मों में भी तो ऐसी परंपराएँ हैं जैसे ख्रिश्चन धर्म में Thanksgiving, Halloween, ख्रिसमस में Carol singing होता है,
मुस्लिम धर्म में रमादान के उपवास होते है और ईद साथ में मनाई जाती हैं, ईद में गरीबों में गोश्त (Mutton) बाँटा जाता हैं, नवजात शिशु का अकीका (मुंडन समान विधि) करते हैं तब बेटी के जन्म पर एक पशु और बेटे के जन्म पर दो पशुओं की बलि (कुर्बानी) देकर गोश्त गरीबों में बाटते हैं, अपनी आय का विशिष्ट भाग जकात के रूप में दान देते है आदि...
तो फिर सनातन हिंदु धर्म की क्या विशेषता हैं ?
जैसे हमने पहले ही स्पष्ट किया हैं, इस लेखश्रृंखला का उद्देश हिंदु धर्म की अन्य धर्मों से तुलना करना नहीं हैं और ना ही किसी एक धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए अन्य धर्मों को नीचा दिखाना हैं !
हम सनातन हिंदु धर्म की प्रथा - परंपराओं पर, पद्धतियों पर विचार कर रहें हैं और हमारे धर्म को समझने का प्रयास करते रहेंगे।
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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