#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १६९ - बुधवार दि . २९.११.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
पिछले भाग में हमने सनातन हिंदु संस्कृती के उज्वल पक्ष को देखा। किंतु कुछ प्रथा - परंपराएँ ऐसी हैं जिनका समर्थन नहीं किया जा सकता ! कुछ प्रथाएँ निंदनीय हैं और कुछ परंपराओं के मूल कारण समझनेपर यद्यपि उनका समर्थन नहीं करेंगे किंतु धीरे धीरे उनमें परिवर्तन के प्रयत्नों को गति देने का प्रयास अवश्य कर सकते हैं।
हम ऐसी प्रथाओं पर विचार करेंगे।
जैसे बालविवाह की पद्धति है।
प्राचीन काल में बालविवाह के उदाहरण प्रायः नहीं पाए जाते है। उपवर राजकन्याओं के स्वयंवर की प्रथा से, पार्वती द्वारा विवाहयोग्य आयु होने पर शिव को प्राप्त करने के लिए तप करने के आख्यान से और सावित्री को अपना पति स्वयं चुनने का अधिकार उनके मातापिता द्वारा दिए जाने की घटना से यह स्पष्ट हैं की कन्याओं के (और पुत्रों के भी) विवाह के लिए योग्य समय निर्धारित था।
अर्जुन द्वारा अभिमन्यू के साथ उत्तरा के विवाह की घटना अपवाद मानी जाती है क्योंकि इतनी कम आयु में विवाह यह आर्यों की पद्धति नहीं थी। वह परिस्थितीवश लिया गया निर्णय था क्योंकि अर्जुन विराट के विवाह प्रस्ताव का मान रखना चाहते थे परंतु स्वयं उत्तरा से विवाह नहीं करना चाहते थे।
अतः यह निश्चित हैं कि हमारी संस्कृती बालविवाह के पक्ष में नहीं थी।
ऐसे में आज भी हिंदु समाज में अनेक क्षेत्रों में पाई जानेवाली बालविवाह की प्रथा का क्या कारण हैं ?
मान्यता हैं कि साधारण १२०० वर्ष पूर्व भारत देश पर परकी आक्रमणों के पश्चात यह पद्धती प्रारंभ हुई।
यह आक्रमक स्त्रियों पर अत्याचार करते थे, उनका अपहरण करते थे। इसलिए बेटियों को अल्प आयु में ब्याह कर उनकी सुरक्षा का दायित्व ससुराल पक्ष को सौंपने का मार्ग अपनाया गया।
ससुराल की प्रथा - परंपराओं में छोटी आयु की कन्याएँ अपेक्षाकृत आसानी से ढल जाती थी इसलिए उस पक्ष से भी इस पहल का स्वागत ही किया गया।
परिणामतः स्त्रीशिक्षा की पद्धति घटती गई और अधिकांश स्त्रियाँ घर में कैद होकर रह गई।
यद्यपि इस विचारधारा का समर्थन नहीं किया जा सकता किंतु इसका मूल परकी आक्रमकों द्वारा किए जानेवाले अत्याचारों में है यह समझनेपर यह भी स्पष्ट होता हैं कि यह मूल भारतीय अथवा सनातनी हिंदुओं की पद्धति नहीं है !
किंतु किन्ही विशिष्ट कारणों से हिंदु समाज ने इस पद्धति का अंगिकार किया भी था तो अब उसे त्यागने का समय है।
हम सनातनी हिंदु धर्माभिमानी अवश्य हैं किंतु हमारा धर्म हमें बांधता नहीं हैं, मुक्त करता है, हमारे धर्म में परिवर्तनशीलता को मान्यता है जो हमें अनिष्ट प्रथाओं के उच्चाटन के लिए बल प्रदान करेगी !
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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