#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १६३ - दि. ०३.११.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
जैसा कि हमने देखा था हिंदु धर्म परिवर्तनशील हैं।
प्राचीन काल में यज्ञ में पशुओं की बलि दी जाती थी और सोमपान को मान्यता थी।
किंतु धीरे धीरे धार्मिक अनुष्ठानों में परिवर्तन आने लगा। बलिदान और आहुति की कल्पना कायम रहीं परंतु पशु बलि की प्रथा नष्ट होने लगी। आधुनिक काल में बलि प्रतिक रुप में किया जाता हैं, साधारणतः अखंड कुम्हडा काटकर बलि की विधि पूर्ण की जाती हैं।
वैसे यज्ञ में बलिदान का एक और अर्थ भी हैं। मन की नकारात्मक भावनाएं और मन के ओछेपन का यज्ञ के निमित्त बलिदान करना अपेक्षित है।
आहुति में घी, तिल, यव, पायस (चावल व दूध की खीर), नारियल, समिधा (आम, पीपल वट, शमी इत्यादी के साथ अन्य भी कुछ पेडों की लकडी) आदि पदार्थ होते है। इसकी आलोचना अनेक बार यह कहकर की जाती हैं कि यह अन्न को अग्नि में नष्ट करने का अयोग्य विधि हैं।
हम सनातनी हिंदुओं को इसपर सोचने की आवश्यकता हैं।
विशिष्ट वस्तुएं अग्नि को अर्पण करनेपर वह हल्की होती हैं व धुएं के रुप में हवा में फैलती है। जैसे मिर्च खानेपर केवल खानेवाले को उसका तीखा स्वाद मिलता है, परंतु मिर्च अग्नि में पड जानेपर आसपास के सबको सांस के माध्यम से उसके तीखेपन का अनुभव मिलता है ! यही तमाखु के साथ भी होता है।
यज्ञ में विशिष्ट वस्तुओं की आहुति देनेपर वह धुएं के रुप में वातावरण में फैलती है जिससे रोगाणु व विषाणु नष्ट होते हैं। प्रदुषण नष्ट करने के लिए भी हवन और आहुति सहाय्यक होती है। प्रदुषण के दुष्परिणाम झेल रहे आधुनिक नागरिक वातावरण की शुद्धी का महत्व अवश्य समझ पाएंगे। इसलिए आहुति से अन्न नष्ट करने की बात भ्रमित करनेवाली हैं।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं कि समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हे हिंदु धर्म से जुडी प्रत्येक बात खटकती है, जैसे यज्ञ में आहुति के लिए अन्न नष्ट करने का मुद्दा वह उठाते हैं।
परंतु धनी / प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा आयोजित समारोहों में पदार्थों की संख्या इतनी अधिक होती हैं कि एक व्यक्ति के लिए चखना भी संभव ना हो। साथ ही अधिक मात्रा में अन्न बनाया जाता है और फेंका भी जाता हैं। इसका तो समान आवेश से विरोध नहीं किया जाता❗
मुंबई जैसे शहरों में कबूतरों को अनाज खिलाकर 'पुण्य बटोरने' के अनेक इच्छुक पाए जाते हैं। वस्तुतः अनाज की इतनी अधिक मात्रा में उपलब्धता के कारण कबूतरों की संख्या अनावश्यक रुप से बढ रहीं हैं जो नैसर्गिक संतुलन के लिए हानिकारक हैं। यज्ञ की आहुति से आपत्ति करनेवाले अनाज के इस दुरुपयोग विरोध करते तो दिखाई नही देते हैं❗
आजकल सागर में यांत्रिक ट्रॉलर्स द्वारा मछली पकडी जाती है और यह वर्ष के पूर्ण १२ महिने किया जाता हैं। परंपरागत मच्छीमारी वर्षाऋतु में बंद रखी जाती हैं। क्योंकि यह समुद्री जीवों के प्रजनन का समय होता हैं। इनके जाल में मछली के बच्चे फंसते नहीं हैं, किंतु ट्रॉलर्स के जाल बारीक होते है जिसमे जमा समुद्री जीवों के छोटे बच्चे बाद में मृतावस्था में फेक दिए जाते हैं।
प्रकृति के साथ इतना भीषण और क्रूर खिलवाड ?
इसका विरोध उतने आवेश से क्यों नहीं किया जाता❗
वस्तुतः अनेक हिंदु धर्मी अपने धर्म की अच्छाइयों का कारण नहीं जानते, अपने कर्मकांडों में समाहित विज्ञान को नहीं जानते इसलिए हिंदुओं की पध्दतियाँ , परंपराएँ अत्यंत सरल लक्ष्य बन जाती हैं ❗
हम इसके लिए क्या कर सकते है इसपर अवश्य विचार करें !
हमें अन्य धर्मियों पर निशाने साधने की आवश्यकता नहीं हैं, बस, अपने धर्म की सेवा करनी है🙏🏼
गर्व से कहे 👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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