#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १७१ - सोमवार दि . ०४.१२.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
हिंदुओं में विवाह के संबंध में अत्यंत आक्षेपार्ह और क्रूर पद्धति सती प्रथा की रही हैं।
पति की मृत्यु के पश्चात पत्नी का जीवन का अधिकार नकारने की और उसे अमानवी पद्धति से जलाकर मृत्यु की ओर धकेलने की पद्धति सर्वथा निंदनीय है।
परंतु यह हमारे शास्त्रों में नहीं लिखा है। तो फिर इस प्रथा का प्रारंभ क्यों हुआ ?
इसके विभिन्न कारण पाए जाते है।
एक महत्वपूर्ण कारण बंगाल प्रांत से संबधित है। यहाँ पुरुष की मृत्यु के पश्चात उसकी संपत्ति पूर्णतः उसकी पत्नी के नाम हो जाती थी। परिवार अगर धनी हो तब भी विशाल संयुक्त परिवार के अन्य सदस्य जैसे भाई, भतीजे आदियों को इसमें हिस्सा नहीं मिलता था। जिन्हे पैसे का लोभ हो ऐसे लोगों के लिए यह संकट ही था। परंतु विधिक नियमों के अनुसार (legally) पत्नी के नाम पर संपत्ति होने के कारण उनके हाथ बंध जाते थे। ऐसे में मृत पुरुष की संपत्ति प्राप्त करने के लिए उसकी पत्नी की भी मृत्यु यहीं एकमात्र मार्ग सोचा गया। अत्यंत धूर्तता से इसे धर्म के आवरण में लपेटकर सतीप्रथा प्रारंभ की गई।
स्त्रियों की भावनाएँ और उनके सम्मान के लिए जिनके मन में सदैव उपेक्षा की ही भावना रहीं थी ऐसे पुरुषों के लिए स्त्री के जीवित रहने के अधिकार का भी कोई मूल्य नहीं था। स्त्रियों को पति की चिता पर जलाकर मरने के लिए विवश किया जाता था। इसके लिए अत्यंत क्रूर उपाय किए जाते थे। उस अभागिनी स्त्री को अफीम अथवा अन्य मादक पदार्थ खिलाकर अर्धचेतनावस्था (half conscious) अवस्था में रखा जाता था जिससे उसे अपने वेदनादायी भविष्य का आभास ना हो। फिर भी यदि चिता का दाह सहन ना होकर वह बाहर कूदने का प्रयास करें तो चारो ओर से लंबे लंबे बांस की सहायता से उसे अंदर धकेला जाता था।
आततायी समाजपुरुषों ने स्त्रियों का चिता में से बाहर आना रोकने के लिए एक और उपाय ढूंढा था। चिता जमीन पर नहीं रखी जाती थी, उसके लिए अत्यंत गहरा गढ्ढा खोदा जाता था। जलती चिता से बाहर कूदना कदाचित संभव भी हो परंतु धधकती आग से गढ्ढा चढकर बाहर आना असंभव था !
सतीप्रथा के उदाहरण उत्तरी भारत विशेषतः राजस्थान में और महाराष्ट्र में भी पाए गए है। यहाँ उस स्त्री की संपत्ति हथियाने का कारण नहीं होता था परंतु इन प्रांतो में विधवाओं की स्थिति इतनी दयनीय थी की उस भविष्य से घबराकर स्त्रिया स्वयं ही सती बनने का निर्णय लेती थी। समाज का दबाव और कुल परंपराएं यह कुछ और भी कारण होते थे।
विश्व के अन्य भागों में भी इसके समान ही प्रथा पाई जाती थी। जैसे पुरातन काल में मिस्त्र में (इजिप्त) राजपुरुषों और सम्मानित धनी व्यक्तियों को मृत्यु के पश्चात पिरामिड में ममी के रुप में दफनाया जाता था। उनके मृत्यु पश्चात जीवन में उपयोग के लिए विभिन्न वस्तुएँ जैसे रेशम के वस्त्र, अलंकार उच्च कलाकारी के बर्तन आदि भी पिरामिड में रखे जाते थे। इसके साथ ही उसकी पत्नी / उपस्त्रियाँ आदियों को उनकी सेवा के लिए पिरामिड में दफनाया जाता था।
परंतु अन्य संस्कृतियों द्वारा अमानुषता के उदाहरण हमारे देश में हुए अपराधों का समर्थन नहीं हो सकते हैं, नहीं होने चाहिए !
हमारी सनातन संस्कृती के क्रूर और अमानुष वास्तव पर लज्जित होना ही हमारा धर्म है !
किंतु क्यों हम इसे अपने गौरवशाली धर्म और परंपरा के आख्यान का भाग बना रहें हैं ?
क्योंकि हम सनातनी हिंदु मानवधर्म के उच्चतम मूल्यों की रक्षा करना चाहते है। भूतकाल में यदि गलतियाँ हुई हैं तो हम उनके लिए लज्जित हैं और हमारा प्रण रहेगा की भविष्य में हम उन्हे ना दोहराएं। परंतु इसके लिए प्रथम अपने पापकर्म को मानना पडता है!
हम अपने धर्माख्यान में यह भी करेंगे और अपने धर्म व संस्कृती के उज्वल व न्यायपूर्ण भविष्य के लिए कटिबद्धता का निश्चय करेंगे !
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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