#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १७७ - सोमवार दि. १८.१२.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
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उपासना पद्धति का महत्व : भाग : २
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सनातन हिंदु धर्म में उपासना संबधी विशिष्ट नियमों का पालन किया जाता हैं। आज हम उनमें से कुछ नियमों के महत्व पर विचार करेंगे।
१. स्तोत्र पठन व आरती की पद्धति
घर में अथवा मंदिर में स्तोत्र का पठन और पूजा के समय आरती का उच्चार जोर से किया जाता हैं। स्तोत्र का आवर्तन / आरती सशब्द ही होती हैं, कभी भी इसका उच्चार टालकर मूक आवर्तन नहीं किया जाता है अथवा नहीं करना चाहिए।
नियमित उपासना के स्थान पर दैवी - पवित्र शक्तियाँ वास करने करती हैं। इससे न केवल उपासक व्यक्ति का बल्कि उस स्थान का संरक्षण कवच सशक्त होता हैं। ऐसे में वहाँ पर निवास करनेवाले सभी व्यक्तियों को उस सुरक्षा कवच का लाभ होता हैं।
आधुनिक काल में चुनावों के पूर्व राजनैतिक पक्षों द्वारा शक्तिप्रदर्शन किया जाता हैं। विश्व के अनेक देश एकल रुप से अथवा अन्य देशों के साथ मिलकर सैनिक अभ्यास / संचलन करते हैं। इससे आपसी मित्रभावना व समन्वय बढता हैं और इसका उद्देश संभाव्य शत्रुओं को अपनी सैनिकी शक्ती व तैयारी दिखाना यह भी होता हैं ताकि शत्रु आक्रमण करने का विचार छोड दें।
स्तोत्र और आरती का उच्चरव से पठन करने का यह एक और कारण हैं !
यह ईश्वरी शक्तियों की उपासना के फलस्वरूप प्राप्त हुए संरक्षण कवच का शक्तिप्रदर्शन हैं ! इस प्रकार स्तोत्र - मंत्र व आरती का उच्च स्वर में पठन उन दुष्ट शक्तियों के लिए हमारा शक्तिप्रदर्शन ही होता है। इससे हम यह घोषणा करते हैं कि हमारे साथ और उस विशिष्ट स्थान पर देवशक्तियों का वास हैं और आक्रमण का प्रयत्न उनके द्वारा विफल किया जाएगा !
वातावरण में ईश्वरी व उदात्त शक्तियों के साथ दुष्ट शक्तियाँ भी होती हैं। जिस प्रकार सेना देश की सीमाओं का रक्षण करती हैं उसी प्रकार ईश्वर की उपासना के पश्चात उस स्थान का रक्षण ईश्वरी शक्तियाँ करती हैं।
स्तोत्र - आरती आदि का उच्चस्वर में पठन कर उस स्थान के स्वामी के नाम की घोषणा करते हैं। वातावरण में विचरण करनेवाली दुष्ट शक्तियों को हम बताते हैं कि उस स्थान को उपासना के कारण दैवी शक्तियों ने संरक्षित कर रखा हैं ।
वैसे इस का परिणाम यह भी होता हैं कि जैसे देश में देशभक्त व देशद्रोही दोनो ही रहते हैं और सेना द्वारा सीमाओं के रक्षण का लाभ दोनों प्रकार के लोगों को मिलता है वैसीही व्यवस्था यहाँ भी निर्माण होती हैं। किंतु महत्वपूर्ण तथ्य यहीं हैं कि नियमित रूप से स्तोत्र - मंत्र आदि के उच्च स्वर में पठन से वह स्थान उच्च कोटी की सुरक्षा प्राप्त करता हैं !
साथ ही स्तोत्र, मंत्र आदि के पठन से विशिष्ट मंगल ध्वनितरंगो की निर्मिति होती है। इससे वातावरण निर्मल और प्रसन्न होता है और वातावरण में यदि घुटन, अप्रसन्नता अथवा निराशा के तत्व हों, तो वह दूर होते हैं !
इन इच्छित परिणामों के लिए कुछ निर्बंध आवश्यक हैं।
आजकल यह कारण बताया जाता हैं कि मंत्रों का उच्चारण बहुत कठिन हैं और वेदशाला में जाकर उनका अध्ययन सबके लिए संभव नहीं हैं। इसलिए स्तोत्र और मंत्रोंका 'सुलभीकरण' किया जाता हैं। परंतु इससे लाभ नहीं, हानि ही होती हैं।
भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में ऋषभ, गंधार, धैवत व निषाद व मध्यम (रे, ग, म, ध, नि) इन स्वरों की विशेषताएँ हैं।
इनमेंसे 'रे, ग, ध, नि' यह स्वर सामान्य के साथ ही 'कोमल' भी होते है और 'म' यह स्वर सामान्य के साथ 'तीव्र' भी होता हैं।
इसके अतिरिक्त प्रत्येक राग में प्रयुक्त स्वर निश्चित होते हैं। सामान्य स्वर, कोमल स्वर व तीव्र स्वरों का विशिष्ट प्रकार से प्रयोग ही किसी राग की पहचान होती हैं। इनमें बदलाव करने से राग ही बदल जाते हैं और इच्छित परिणाम (भावनिर्मिती) नहीं हो सकती हैं !
ठीक इसी प्रकार मंत्रों में भी विशिष्ट 'स्वर' होते हैं। उनके अनुसार उस अक्षर का उर्ध्व / अधो ( उपर / नीचे जोर देकर ) उच्चार करना होता हैं। उनमें किस अक्षर का उच्चार लघु अथवा दीर्घ करना इनके नियमों का पालन करना भी आवश्यक है।
जिस प्रकार हम गणित के सूत्र (Formula) अथवा रसायनशास्त्र में पदार्थों के Chemical Names सुयोग्य पद्धति से बताएंगे तभी सही उत्तर पाएंगे, उसी प्रकार स्तोत्र व मंत्र का पठन भी विशिष्ट पद्धति से ही करना आवश्यक हैं।
सोचिए, रसायनशास्त्र को सुलभ करने के लिए यदि H2O की जगह हम HO लिखेंगे तो क्या उसका अर्थ पानी होगा ?
अथवा H2SO4 की जगह यदि हम HSO लिखेंगे तो इसका अर्थ Sulfuric Acid होगा ?
यदि यह संभव नहीं हैं तो मंत्रों को सुलभ करना भी संभव नहीं हैं !
जिसप्रकार गणित - भौतिकशास्त्र - रसायनशास्त्र सीखना पडता हैं उसी प्रकार स्तोत्र और मंत्र भी सीखने पडेंगे, इसमें shortcut नहीं हो सकता है, नहीं होना चाहिए!
कैसे ?
यह प्रत्येक व्यक्ती को ढूंढना होगा।
कहते हैं, जहाँ चाह वहाँ राह !
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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