#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १७८ - बुधवार दि. २०.१२.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
----------------------------------
उपासना पद्धति का महत्व : भाग : ३
----------------------------------
स्तोत्र और मंत्रों के उच्च स्वर में उच्चारण के ठीक उलट इष्टदेवता के जाप की पद्धति है !
सनातन हिंदु धर्म की मान्यता है कि इष्टदेवता का नामस्मरण किसी भी समय और किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। इसके लिए पहले स्नान करना, विशिष्ट प्रकार के वस्त्र पहनना, विशिष्ट पद्धति से बैठना, विशिष्ट पूजासामग्री की आवश्यकता आदि कोई भी बंधन नहीं है। केवल श्रद्धा और भक्ती से देवता का अंतःकरणपूर्वक स्मरण करने से मनुष्य का मन निर्मल होता हैं और ईश्वर की ओर उन्मुख होता है।
संत - सत्पुरुषों ने सदैव यहीं उपदेश किया हैं कि मानवजन्म का अर्थ, उद्देश और सार्थकता इसी में हैं कि भगवद् भक्ति में लीन होकर जन्ममृत्यु के चक्र से मुक्ती अर्थात मोक्ष प्राप्त करें।
किंतु सनातन हिंदु धर्म इसके लिए अकर्मण्यता अर्थात कर्म छोड़कर केवल भगवान का ध्यान करना अथवा गृहस्थ जीवन छोडकर संन्यास लेना ऐसा बंधन नहीं रखता हैं !
हम मानते हैं कि सामान्य गृहस्थाश्रमी व्यक्ती भी ईश्वर की आराधना तन्मयता से और सफलतापूर्वक कर सकते हैं। इसके लिए सदैव नामस्मरण करते रहने का सरल उपाय बताया गया है। यह प्रत्येक व्यक्ति को केवल स्वयं के लिए करना होता है। अन्य किसी को भी हमारे मन में निरंतर चलनेवाले नामस्मरण का आभास नहीं कराना चाहिए। तात्पर्य, दिखावा नहीं करना चाहिए।
सामान्य व्यक्ती के सांसारिक दायित्वों को ध्यान में रखकर बताई गई यह पद्धति हैं। किंतु जिसप्रकार विद्यार्थी क्रमशः बालवर्ग से पदवी की शिक्षा तक आगे बढ़ता हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी ईश्वर की उपासना के अगले पड़ावों तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग हैं।
इनमें से एक महत्वपूर्ण मार्ग है इष्टदेवता के मंत्र का विशिष्ट संख्या में - कम से कम १०८ बार - जाप करना।
जाप से उस व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है। उसकी आंतरिक शक्ती में बढ़ोतरी होती हैं। मान्यता यहीं हैं कि ईश्वर का नामस्मरण तो अपनी सुविधा और इच्छा के अनुसार किया जा सकता है परंतु जाप के लिए अपने गुरु से मंत्र प्राप्त करना (गुरुदीक्षा ग्रहण करना) आवश्यक हैं। ईश्वर की उपासना के लिए भी मार्गदर्शन आवश्यक हैं, वैसेही जैसे विज्ञान, गणित आदि पढने के लिए है !
स्तोत्र और मंत्रों का उच्चार सदैव उच्च स्वर में किया जाता हैं। किंतु जाप मन में ही करना होता है, होंठ भी हिलने नहीं चाहिए। १०८ मोतियों वाली जाप की माला से मोती फेरते समय माला ढक कर रख जाती है। कभी इसके लिए अलग से थैली बनाई जाती है जिसे हाथ में लटकाकर हाथ इस प्रकार रखा जाता है कि माला थैली के भीतर रहें। इससे माला अन्य किसी को भी दिखाई नहीं देती हैं। थैली के पर्याय के रूप में माला को साधारण कपडे से, स्त्रियाँ अपने पल्लू और पुरुष अपने उत्तरीयके छोर से ढक सकते है।
इसका भी कारण है।
दि. १८.१२.२०२३ के भाग १७७ में हमने देखा था की मंत्रोच्चार यह आसुरी शक्तियों को दूर रखने के लिए शक्तिप्रदर्शन समान भी है।
किंतु कोई भी देश अपने सभी अत्याधुनिक शस्त्रात्र, बम अथवा अन्य उपकारणों का प्रदर्शन नहीं करता हैं। शस्त्रसंचलन और सैनिक अभ्यास तो मात्र शत्रु को आगाह करने के लिए होता है कि वह युद्ध का विचार ना करें ! परंतु क्या तुरुप के पत्ते कोई प्रतिस्पर्धी के सामने रखेगा ?
ठीक इसी प्रकार जाप से जिस प्रकार और जिस मात्रा में उस व्यक्ती की आध्यात्मिक शक्ती में बढोतरी होती है उसे गोपनीय रखा जाता है। दुष्ट शक्तियों पर मात करने के लिए अर्जित बल का प्रदर्शन ना करना और ऐसी शक्तियों को अंधेरे में रखकर अपना बल निरंतर बढाना इसके लिए जाप की संख्या अन्य किसी के भी सामने उद्घटित नहीं की जाती है, अपवाद केवल अपने गुरु का होता है! इसलिए जाप की माला को पूर्णतः ढककर होंठ ना हिलाते हुए ही जाप करना चाहिए।
परंपराओं के अर्थ अत्यंत गहरे हैं जिन्हे समझकर उनका सम्मान व पालन करना अंतिमतः हमारे हित में है।
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें