#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १८० - सोमवार दि. २५.१२.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

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 उपासना पद्धति का महत्व : भाग : ५
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सनातन हिंदु धर्म में अन्य भी विविध प्रथा - परंपराएँ, पूजाविधि, अनुष्ठान आदि हैं। इनमें विशिष्ट देवता का विशिष्ट प्रकार से पूजन करना, जैसे शिवजी का दुग्धाभिषेक, विशिष्ट देवता को विशिष्ट फूल - पत्री अर्पण करना जैसे गणेशजी को दूब (दुर्वा), अपामार्ग (चिरचिटा) के पत्र व गुडहल (Hibiscus) का फूल, श्रीविष्णु को तुलसी, शिवजी व वरुणदेवता को बेल के पत्र, देवी माँ को विविध प्रकार के पत्र अर्पण करना आदि उदाहरण हैं।

पूजा के लिए पुरोहितजी सामग्री की सूची देते है और पूजा के समय उनके मार्गदर्शन में हम उसे अर्पण करते हैं।
किंतु इन सब का गहरा अर्थ हैं, उनके कारण भी हैं। 
कदाचित प्राचीन काल में मनुष्य को कोई कल्पना स्वीकार्य बनाने के लिए 'धर्मप्रेरणा' सबसे उपयुक्त होगी इसलिए यह कारण धर्म के आवरण में लपेट दिए गए हो सकते हैं और इसिलिए इन सबको देवताओं के साथ, पूजाविधि के साथ जोडा गया हो सकता है। इससे उस काल के मानवसमाज ने इसका अनुसरण - पालन श्रद्धा से किया होगा।

हम इनमें से कुछ परंपराओं की मानवी जीवन के लिए उपयुक्तताओं को देखेंगे।

१) शिवजी तथा वरुणदेवता की पूजा बेल के पत्रों से की जाती है। अर्थात इसके लिए बेल का वृक्ष घर के आसपास लगाकर उसका संवर्धन करना आवश्यक होता है।
वस्तुतः बेल वैद्यकीय दृष्टी से अत्यंत उपयुक्त होता हैं। पचन संबधी विकारों के लिए यह तत्काल गुणकारी औषधी हैं। अपचन के लिए बेल का मुरब्बा अथवा शरबत लिया जाता है।

२) श्रीविष्णु, श्रीकृष्ण व शंख की पूजा तुलसीपत्र से की जाती हैं। तुलसी के गुणों से तो सभी परिचित हैं। 
कफ संबधी विकारों के लिए तुलसी का अर्क प्राशन किया जाता है, त्वचा विकारों के लिए तुलसी के पत्तों का लेप लगाया जाता है। कान का दर्द - सूजन के लिए तुलसी का अर्क कान में डाला जाता है। आयुर्वेद में तुलसी के और भी अनेक उपयोग बताए गए हैं।
इतनी उपयोगी वनस्पति सहजता से उपलब्ध होनी चाहिए इसिलिए पुरातन काल में आंगन में तुलसीवृंदावन रखकर प्रातः और संध्यासमय उसकी पूजा करने की पद्धति बनाई गई।

३) श्री गणेशजी की पूजा मुख्यतः दूब, गुडहल के फुल और अपामार्ग पत्रों से की जाती है।
दूब से शरीर का दाह कम होता हैं। शरीर की गर्मी के कारण नाक से खून बहता है तब नाक में दूब का रस डालना गुणकारी होता है। कुछ त्वचाविकारों में दूब का रस मख्खन में मिलाकर उसका लेप शरीर पर लगाया जाता है।
सनातन हिंदु धर्म के सोलह संस्कारों में गर्भाधान संस्कार महत्वपूर्ण होता हैं। हमारे धर्म में विवाह पश्चात सन्तानोपत्ती यह धर्म माना गया हैं इसलिए गर्भाधान संस्कार अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इसमें भी दूब के रस का उपयोग होता है। क्योंकि यह स्त्रियों के लिए प्रजनन क्रिया में गुणकारी हैं व इससे संबधित अनेक दोषों का निवारण करने के लिए उपयुक्त हैं।
यह दूब की उपयुक्तता के कुछ उदाहरण मात्र हैं। आयुर्वेद में दूब का प्रयोग अन्य भी अनेक विकारों के उपचारों के लिए किया जाता हैं।

गुडहल (Hibiscus 🌺) का पौधा भी औषधी गुणों से युक्त होता हैं। इसके पत्ते व फूलों का अर्क बालों का झडना रोकने हेतु उपयुक्त हैं व यह केशवर्धक होता हैं। ताजे पत्ते व फुलों का रस बालों में लगाया जाता हैं और केशवर्धक तेल व औषधी में भी इसका उपयोग किया जाता है।
चिरचिटा भी औषधी गुणों से युक्त हैं। दांतों के दर्द का उपचार, घावों का उपचार, अति भूख लगना (भस्मक) का विकार इस के लिए इस वनस्पति का उपयोग किया जाता है।

उपर केवल कुछ उदाहरणों पर चर्चा की गई हैं। उपर्युक्त पेड़ - पौधे आवश्यकता के समय उपलब्ध हो सके इसलिए उनका उपयोग विविध देवताओं की पूजा - अर्चना में बताया गया हो सकता हैं। आधुनिक वैद्यकशास्त्र की तयार औषधि आजकल मिलती हैं परंतु प्राचीन काल में जब वनस्पतिजन्य / अन्य नैसर्गिक आयुर्वेदिक औषधि ही थी तब इन वनस्पतियों की उपलब्धता अवश्य महत्व रखती होगी।

हिंदु परंपराओं की पूजाविधि - अनुष्ठान संबधी पद्धतियों पर हम आगे और थोडा विचार करेंगे।

गर्व से कहे👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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