#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १८१ - बुधवार दि. २७.१२.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
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उपासना पद्धति का महत्व : भाग : ६
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सनातन हिंदु धर्म में विशिष्ट पूजाओं के लिए विशिष्ट पेडों का भी महत्व हैं। विविध ऋतुओं में सनातनी हिंदुओं के त्योहार, पर्व व पूजाओं में भी विशिष्ट पदार्थों का ही भोग चढाया जाता है।
विभिन्न प्रांतों में भिन्न भिन्न परंपराएं हैं। इस भिन्नता का कारण विशाल हिंदुबहुल प्रदेश में भौगोलिक स्थिति के कारण स्थानिक आवश्यकता और वहाँपर वस्तुओं की उपलब्धता यह है। अर्थात परंपराओं /पध्दतियों में भिन्नता हिंदुओं के अंतर्गत भेद के कारण नहीं हैं, बल्कि इनके मूल में वैज्ञानिक कारण हैं। उन्हे केवल धर्म के आवरण में लपेटा गया हैं।
उदाहरणार्थ बरगद, इमली, आँवले, नीम के पेडों का महत्व होता है, इनकी पूजा की जाती है, इनसे बने व्यंजनों का भोग लगाया जाता है, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को आँवले के पेड़ के नीचे भोजन किया जाता है।
बरगद के पेड़ की दीर्घ और शीतल छाया होती हैं, इसपर अनेक पक्षी घोंसले बनाते हैं जो जैव विविधता, पर्यावरण संतुलन और खाद्य श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसका विस्तार अपने आप होता रहता हैं जिससे वृक्ष संवर्धन होता है। इस वृक्ष की पूजा की जाती है।
इमली से बने व्यंजनों का कुछ धार्मिक कार्यों में महत्व है। वस्तुतः इमली में अनेक औषधी गुण हैं।
आँवले को श्रीविष्णु का प्रिय फल बताया गया है। इसके गुणों से सभी परीचित हैं। सर्दी - खांसी - कफ - दमा आदि विकारों के प्रतिरोधक के रुप में यह शक्तिवर्धक हैं। यह पचनक्रिया के लिए भी उपयुक्त हैं। इसका प्रयोग अनेक विकारों की चिकित्सा में किया जाता है।
हिंदु नववर्ष अर्थात गुडीपाडवा के दिन नीम का महत्व विशेषकर महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में होता हैं।
नीम भी औषधी गुणों से भरपूर हैं। यह त्वचा रोगों के उपचार के लिए उपयुक्त हैं, बालों में जुएं व लीख पर इसके रस का उपाय किया जाता हैं, पेट के कृमि पर, दातों के उपचार में भी यह उपयुक्त हैं। इससे दातून भी बनाएं जाते हैं। विविध विकार व रोगों के उपचार के लिए इसके पत्ते व खाल का भी उपयोग होता हैं।
नीम के पर्यावरणीय लाभ भी हैं। इस प्राणवायू (0xygen) का स्तर बढता है। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय प्रदेश में गर्मीं के ऋतु में भी नीम से प्राप्त अति शीतल छाया का महत्व हैं।
यह कुछ उदाहरण मात्र हैं जिससे यह स्पष्ट होता हैं कि यह सब पेड पर्यावरण की दृष्टी से, जैव श्रृंखला व अन्न श्रृंखला के लिए और औषधोपचार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। धार्मिक दृष्टी से इन्हे कदाचित इसिलिए 'अत्यावश्यक' श्रेणी में रखा गया हैं जिससे इन पेडों का रक्षण व संवर्धन किया जाएं।
सोचिए, जिस विधाता ने संपूर्ण सृष्टी का निर्माण किया हैं उसके लिए कुछ व्यंजन पूजा में भोग के स्वरूप में प्राप्त करना क्यों आवश्यक होगा ?
ईश्वर को किसी वस्तु की कमी हैं क्या ?
इन सब नियम / परंपराओं का उद्देश मानवसमाज को इन वृक्षों की उपलब्धता सरलता से सुनिश्चित करना यही हैं।
हम भाग्यवान हैं कि गहरे अर्थोंवाली सनातनी हिंदु परंपरा का आशीर्वाद हमें प्राप्त हुआ हैं।
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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