#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १८२ - शुक्रवार दि. २९.१२.२०२३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
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उपासना पद्धति का महत्व : भाग : ७
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सनातनी हिंदु धर्मपराओं में अनेक त्योहार और पर्व हैं।
ऐसा प्रत्येक धर्म में होता है। मनुष्य को धर्म की और उन्मुख रखने के लिए थोडे थोडे अंतराल में धर्मानुसार विशिष्ट कर्म की योजना साधारणतः प्रत्येक धर्म में पायी जाती है। प्रत्येक धर्मकार्य के संबध में विशिष्ट नियम व पद्धति भी होती है।
तब सनातनी हिंदु धर्मपरंपराओं की विशेषता क्या है ?
हम औरों से भिन्न क्यों हैं ?
हमारी परंपराएँ विज्ञानाधिष्ठित होने पर हम गर्व क्यों करते हैं ?
यह समझने के लिए आज हम हमारी विभिन्न परंपराओं में निहित खाद्यसंस्कृती पर विचार करेंगे।
इससे पूर्व, अन्य धर्मों के धार्मिक कार्यों के विशेष खाद्य पदार्थों पर विचार करना भी प्रासंगिक होगा।
ख्रिश्चन धर्मीय उनके सबसे महत्वपूर्ण पर्व ख्रिसमस में वैशिष्ट्यपूर्ण केक बनाते है। Thanksgiving पर टर्की नामक पक्षी विशिष्ट प्रकार से पकाया जाता हैं।
Easter में विविध व्यंजन बनाए जाते हैं किंतु ख्रिश्चन धर्म का प्रसार मुख्यतः जहाँ हुआ हैं अर्थात युरोप व अमरीका में मुख्यतः मेमने (lamb) के मांस से व्यंजन बनाए जाते हैं।
मुस्लिम धर्मीय बकरा क्रय करते हैं और बकरी ईद पर उसे कुर्बान किया जाता हैं। इसका गोश्त (mutton) गरीबों में, सगेसंबंधियों में बाँटा जाता हैं और उससे घर में भी बिर्यानी बनाई जाती है। इस्लाम का प्रारंभ जिस प्रदेश में हुआ था वहाँ खजुर उगता है इसलिए इससे बने मीठे व्यंजन इस्लाम धर्मियों में पवित्र माने जाते हैं। विश्व के अन्य भागों में इस धर्म के प्रसार के साथ स्थानीय वस्तुओं से बने पकवान जैसे बकलावा, फिरनी, शीर खुर्मा आदि विभिन्न पकवानों का महत्व भी स्वाभाविक रुप से बढ़ा हैं।
अब हम सनातनी हिंदु संस्कृती में विविध पर्व - त्योहार व अनुष्ठानों में बनाए जानेवाले व्यंजनों की प्रासंगिकता, उपयुक्तता और उनमें निहित आहारशास्त्र अर्थात विज्ञान पर विचार करेंगे।
महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं कि हमारे धर्म और संस्कृति में ऋतुनुसार बदलते वातावरण में मानवी शरीर की आवश्यकताएँ और पचनक्षमता, उस भौगोलिक स्थान पर वस्तुओं की उपलब्धता और भिन्न भिन्न पाक पद्धतियाँ (Cooking styles) का विचार धार्मिक कार्यों के लिए भी किया गया हैं।
इसमें भी एक तथ्य हमारे पूर्वजों और शास्त्रकारों की बुद्धिमत्ता व दूरदर्शिता का निर्देशक हैं। हमारे धर्म में 'पायस' अर्थात चावल व दूध से बनी खीर को सर्वश्रेष्ठ पकवान बताया गया हैं। प्रत्येक प्रांत में यह पकवान याग में आहुति के लिए, देवताओं को भोग चढाने के लिए और श्राद्ध में पितरों को (पूर्वज) ग्रास देने के लिए श्रेष्ठ बताया गया हैं (क्योंकि पितरों का स्थान भी देवताओं समान उँचा हैं)।
विश्व की समस्त खाद्य संस्कृतियों में चावल का स्थान महत्वपूर्व हैं। क्योंकि प्रत्येक स्थान पर चावल की फसल होती हैं। उसके साथ खाए जानेवाले व्यंजन (पूरक खाद्य) बदलते हैं परंतु चावल सरलता से उपलब्ध होता है।
साथ ही दूध भी सहज उपलब्ध होनेवाला पदार्थ हैं। हिंदु संस्कृती में वैसे भी गोपालन महत्वपूर्ण रहा हैं।
इसलिए गोरस और चावल इन दो सहजता से उपलब्ध होनेवाले पदार्थों से बने पायस को सर्वश्रेष्ठ पकवान का स्थान देने में हमारे ऋषिमुनियों की दूरदर्शिता का ही परिचय मिलता हैं। इससे ना केवल धर्मकार्यों की सात्विकता भी बनी रहती है और सामान्य जन के लिए धर्मकार्य सुलभ भी बने रहते हैं !
अन्य पवित्र व्यंजनों में उस ऋतुनुसार घटक पदार्थों की उपलब्धता व उपयुक्तता तथा मनुष्य की पचनक्षमता का विचार है जिसके कुछ उदाहरण निन्नानुसार हैं -
१) शीतऋतु के त्योहार : पोंगल, मकरसंक्रांती, लोहडी - इनमें तील और गुड से बने व्यंजनों का महत्व हैं जो शीतऋतु में मानव शरीर के लिए उपयुक्त हैं।
२) विभिन्न त्योहार जैसे गणेशपूजा, नवरात्रि व दशहरा - इन त्योहारों में सात्विक और मानवी शरीर को उपयुक्त पदार्थों से बने व्यंजन बनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए गणेशपूजा हेतु खोबरा व घी से बने मोदक, विविध अनाजों से बने लड्डू, दाल से बननेवाली पुरणपोली (दाल से विटामिन व आवश्यक खनिज पदार्थ मिलते हैं) और खीर आदि।
३) दिवाली यह शीतऋतु के प्रारंभकाल का त्योहार हैं। वर्षाऋतु में पचनक्रिया मंद होती हैं (मंदाग्नि) परंतु दिवाली यह शीतऋतु का प्रारंभ काल होता है। इस काल में मानव शरीर की पचनक्षमता अच्छी होती हैं। शीत ऋतु में शरीर रुखा होने लगता है। ऐसे में स्निग्ध पदार्थ आवश्यक होते हैं। इसलिए इस त्योहार में तले हुए पदार्थ, घी से युक्त मीठे व्यंजन बनाए जाते हैं।
४) उपवास - आजकल इसमें साबुदाना, आलु, मूंगफल्ली आदि खाया जाता हैं किंतु उपवास का अर्थ पचनयंत्रणा को विश्रांति देना हैं इसलिए प्राचीन काल से इसमे दूध - छांछ - फल आदि खाने की ही पद्धति है।
यह केवल कुछ उदाहरण मात्र हैं। इसी प्रकार अन्य भी परंपराओं में निहित विचार को समझनेपर हम यह पाएंगे की हमारी हिंदु संस्कृति प्रत्येक त्योहार - पर्व - अनुष्ठान में एक ही व्यंजन को महत्व ना देते हुए विविध व्यंजनों को महत्वपूर्ण बताती हैं। और यह पूर्णतः आहारशास्त्र अर्थात विज्ञानपर आधारित है!
अपनी प्राचीन संस्कृती पर गर्व और प्रेम करने का यह भी तो एक कारण है !
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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