#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १८३ - सोमवार दि. ०१.०१.२०२४
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
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उपासना पद्धति का महत्व : भाग : ८
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नए कैलेण्डर वर्ष के प्रथम लेख का प्रारंभ हम विश्वकल्याण की प्रार्थना से करेंगे -
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामय:॥
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभागभग्वेत॥
वस्तुतः सनातनी हिंदु संस्कृति में संपूर्ण विश्व के कल्याण की भावना हैं।
हिंदु धर्म के अनुयायियों के लिए तो धर्मकार्य के माध्यम से भी मानवकल्याण की ही योजना बनाई गई हैं।
अन्य धर्मों में भी ऐसी अनेक परंपराएँ और पद्धतियाँ हो सकती हैं किंतु हम यहाँ अपनी धर्मपरंपराओं की व्यापकता और उनके मूल में निहित वैज्ञानिकता को समझने का प्रयत्न करेंगे।
इसमें हम विविध धर्मकार्यों की प्रासंगिकता, उनके मूल में निहित विचार और उनका पालन करने पर मानवी वृत्ती, विचार व स्वभाव पर होनेवाला परिणाम इन्हे देखेंगे।
अन्य धर्मों की अपेक्षा हमारे धर्म में धार्मिक कर्मकांडों की संख्या अधिक हैं।
इसका क्या कारण हो सकता है?
वास्तव में मनुष्य यह स्खलनशील (सहजता से पतित होनेवाला) जीव है। अन्य प्राणियों की तुलना में उपभोग के साधन और संधी की उपलब्धता मनुष्य के लिए अधिक हैं।
पशु पक्षी अपनी नैसर्गिक प्रेरणा से कार्य करते है, उनमें साधारणतः अकारण क्रूरता अथवा लोलुपता नहीं पायी जाती हैं।
किंतु अपनी बुद्धिमत्ता के कारण मनुष्य को अनेक साधन उपलब्ध हो गए है। यह साधन आवश्यक और उपयुक्त तो हैं, किंतु यही मानव की बुद्धी भ्रष्ट करने के कारण भी हो सकते हैं। सात्विक स्वभाव के, संयमी मनुष्य मोहपाश से स्वयं को दूर रखते भी हैं। परंतु कदाचित यह सबके लिए संभव नहीं हो सकता हैं।
कदाचित मनुष्य की आदिम प्रजाति में लोभ, मोह और लालसा के तत्व नहीं होंगे। तब अन्न, आवरण व निवास की प्राथमिक आवश्यकताएँ पूर्ण करने में ही मानव पूर्ण समय व्यस्त रहता होगा। वन में उपलब्ध फल व अन्य खाद्यपदार्थ यदि पूरे ना पडते हों तो तत्कालीन अनगढ़ साधन अथवा शस्त्रों से पशु - पक्षियों की शिकार कर अन्न प्राप्त करना, वृक्षों के पत्ते अथवा खाल अथवा प्राणियों के चमडे से शरीर रक्षण के लिए आवरण बनाना और वन्य प्राणियों से युक्त वन में गुफाएँ अथवा तत्सम स्थानों पर निवास की व्यवस्था करना इसी में आदिम मानव व्यस्त रहा होगा।
किंतु उत्क्रान्ति और प्रगति की प्रक्रिया में शरीर की मूल आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए कम समय लगने लगा। मानव ने तब समय का सदुपयोग नहीं किया, बल्कि बचे हुए समय और उर्जा के कारण मानव की बुद्धी ने विपरीत मोड लिया। धीरे धीरे मनुष्य के स्वभाव में ईर्ष्या व 'अधिक पाने का मोह' ने स्थान बनाया।
और यहीं से मनुष्य के पतन का प्रारंभ हुआ।
उत्क्रान्ति की प्रक्रिया में धर्म के तत्वों की व्याख्या करने के काल में ऋषिमुनियों ने इस पहलू पर भी विचार किया होगा।
गाय बकरियों को बाडे में रखा जाता हैं ताकि वह अपने स्थान से भटक ना जाएं। क्योंकि भटकने पर मांसभक्षी प्राणियों द्वारा उनकी शिकार का संकट भी हो सकता है।
इसलिए बाडे को प्राणियों का कारावास ना मानकर उसे सुरक्षा घेरे के रुप में मानना उपयुक्त होगा।
ठीक इसी प्रकार मानवसमूह के लिए भी विविध धर्मकार्य निश्चित किए गए होंगे। इन कार्यों में कुछ नियम और कुछ प्रतिबंध होते हैं जो मानवी मन को अनुशासित करने के लिए उपयुक्त हैं !
इन्हींपर हम आगे विचार करेंगे।
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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