#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १७३ - शुक्रवार दि. ०८.१२.२०२३

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

हजारो वर्षों से सनातन हिंदु संस्कृती समृद्ध होती रही है। इस काल में हमारे देश ने अनेक परकी आक्रमण देखें हैं। इतने आघात सहन कर भी हमारे धर्म का अस्तित्व बना रहा हैं।

किंतु परकी आक्रमणों से कुछ खरोंचे हमारे समाजजीवन पर, हमारी मान्यताओं पर, हमारी जीवनशैली पर अवश्य आयी हैं। कुछ बदलाव अब हमारे जीवन का भाग बन गए हैं। परंतु यह उतने गंभीर नहीं हैं क्योंकि इनके कारण हमारा धर्म और संस्कृती के मूल्यों पर आघात नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए आहार में बदलाव, दैनंदिन पूजाविधि में कुछ परिवर्तन इ.।

परंतु परकी आक्रमण का प्रभाव जब सनातनी हिंदुओं के विचार पर हुआ तो समाज की बुनाई पर भी उसका अनिष्ट परिणाम हुआ। कदाचित उपरी सोच को इनकी घातकता का आभास ना भी हो, परंतु इन दृष्य परिणामों के मूल में निहित सोच हमारे विचारों के स्त्रोतों के दूषित होने का संकेत देती है !

ऐसा एक परिवर्तन हमारे देश में महिलाओं के वस्त्रों में हुआ। 
जबतक मानवसमूह में सिलाई की कला विकसित नहीं हुई थी तबतक नगर में (urban ) पुरुषों के वस्त्र सूती अथवा रेशम की धोती और उत्तरीय (shwal समान ओढनेवाला वस्त्र) होते थे। ग्रामीण / वनवासी पुरुष साधारणतः सुती वस्त्र व पशुओं की खाल का उपयोग तन ढकने के लिए करते थे।

स्त्रियाँ भी नौ गज की साडी समान कटिवस्त्र पहनती थी। वक्ष ढकने के लिए कपडे की लंबी पट्टी का उपयोग किया जाता था जिसकी पीठ पर गांठ बांधी जाती थी। कंधे ढकने के लिए ओढनी समान लंबे वस्त्र का उपयोग किया जाता था।
इससे स्पष्ट हैं कि स्त्रियों की वेशभूषा सुरुचिपूर्ण और व्यवस्थित अवश्य होती थी परंतु स्त्रियों को आपादमस्तक (पूर्णतः) ढकने का चलन नहीं था।

सिलाई की कला विकसित होनेपर स्त्रियों के चोली पहनने का प्रारंभ हुआ और ओढनी के स्थान पर कटिवस्त्र का पल्लु ओढने की पद्धती अपनायी गई। परंतु तब भी स्त्रियों को कपड़ों में पूर्णतः ढककर रखने की कल्पना हमारे धर्म / संस्कृति में नहीं थी। हमारे पुरातन शिल्पों में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं।

अनेक आदिवासी समूहों में और केरल में (राजघरानों में भी !) विवाह होने पर स्त्रियों को चोली पहनना छोडना पड़ता था। कदाचित यह पद्धति विवाहित स्त्रियों पवित्रता की ओर इंगित करती थी और यह अन्य पुरुषों के लिए विवाहित स्त्री का सम्मान करने की बाध्यता का निदर्शक था।

और यह तब हुआ था जब इतिहास के अनुसार कृषि के विकास के साथ अनेक स्थानों पर पुरुषप्रधान संस्कृति का उदय हो चुका था। यद्यपि इसके प्रभाव से पुरुषों के बढते वर्चस्व के साथ स्त्रियों का स्थान दुय्यम होने लगा था परंतु स्त्रियों को अधिकाधिक कपडों में लपेटकर रखने की आवश्यकता हमारे धर्म में तब भी नहीं मानी गई थी।

साधारणतया १२०० वर्ष पूर्व परकी आक्रमणों के पश्चात इस सोच में परिवर्तन होने लगा। इन आक्रमकों की संस्कृति में स्त्रियाँ निम्न स्तर पर थी और उन्हे पुरुषों की संपत्ति के रुप में देखा जाता था। पुरुषों का दृष्टीकोण उनके लिए उपभोग्या का था। उनकी स्वयं की दृष्टी स्त्रियों के प्रति दूषित होती थी, अतः वह मानते थे की अन्य पुरुष भी स्त्री को वासनामय दृष्टी से ही देखेंगे। स्त्री के प्रति आदर, सम्मान, निर्मल स्नेह यह आक्रमकों की पद्धति ही नहीं थी।

कुछ तो उनके प्रभाव से और कुछ उनकी कुदृष्टी से अपनी स्त्रियों को बचाने के विचार से हमारे देश में घूंघट की, परदा प्रथा की और मस्तक पर पल्लू डालने की पद्धति का प्रारंभ हुआ। इस सोच ने हमारी संस्कृति को ऐसे जकड लिया हैं कि देश के अनेक भागों में इसका सीधा संबध स्त्रियों की शालीनता से जोडा जाता है। घूंघट / पल्लू रखनेवाली स्त्री को मर्यादशील माना जाता हैं और इसे नकारने पर उसे उद्दंड / उच्छुंखल माना जाता हैं !

परकी संस्कृतियों का आगमन अहितकारी होना आवश्यक नहीं हैं। 
पर्शिया (इराण) से आए पारसी धर्मीय ना केवल इस देश की संस्कृति में घुलमिल गए हैं, बल्कि उन्होने इस देश की प्रगति में अहम् योगदान भी दिया हैं।
किंतु पारसी जब इस देश में अतिथी के रूप में आए थे तब उन्होने यहाँ के निवासियों से विनम्रतापूर्वक यहाँ रहने की अनुमति मांगी थी, वह आक्रमणकारियों के रूप में नहीं आए थे। उन्होने इस देश में आने के पश्चात तटप्रदेश के राजा को इस देश में बसने की अनुमति देने का अनुरोध किया था। राजा ने अनुमति देने के लिए कुछ शर्ते रखी थी जैसे वहाँ की भाषा व पहनावे को अपनाना। 
पारसीयों ने भी विनम्रता और उदार भावना से इन शर्तों को स्वीकार किया। आज भी पारसीयों की मुख्य भाषा गुजराती हैं और पारसी स्त्रियाँ गुजरात के सनातनी हिंदुओं के समान साडी बांधती हैं।

इसके विपरीत अन्य परकी आक्रमक इस देश को लूटने के लिए आए थे। उनके द्वारा किए गए दुष्कर्मों पर और उनके यहाँ बसने पर हुए परिणामों पर विचार कर हमें पुनः अपनी गौरवशाली परंपराओं के पुनर्जीवन का प्रण करना चाहिए।

गर्व से कहे👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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