#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १८८ - शुक्रवार दि. १२.०१.२०२४
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
झोराष्ट्रीयन धर्मसमुदाय अर्थात पारसी लोग सर्वाधिक संख्या में भारत में हैं।
वह अग्नि की पूजा करते हैं।
यह एक शांतताप्रिय समुदाय रहा हैं जिसे अपने धर्म में अर्थात अग्निदेवता में व अपने देवदूत (ईश्वर का संदेश मानव तक पहुँचानेवाला धर्मदूत) झरतुष्ट में अत्यंत आस्था होती है। वह अपने धर्म को लेकर आग्रही होते हैं और साधारणत: अपनी धार्मिक परंपराओं का उनके पुरातन मूल स्वरूप में ही निर्वाह करते हैं।
वह धर्मप्रसार में विश्वास नहीं रखते हैं और अन्य धर्मियों की भिन्न देवताएं व उपासना पद्धति के विषय में सहिष्णु भी होते हैं।
यह पर्शिया (आधुनिक इराण) के मूलनिवासी थे। परंतु इराणसहित मध्य पूर्व के देशों में बढते इस्लाम धर्म के कारण झोराष्ट्रीयन समुदाय की कठिनाईयाँ बढने लगी।
धीरे धीरे परिस्थिति ने ऐसी करवट ली की उनके लिए पर्शिया में रहना असंभव होने लगा।
हारकर वह धीरे धीरे अपनी मूल भूमि से स्थलांतर करने लगे। कदाचित भविष्य में कभी मूल भूमि में लौटने की आशा के कारण प्रारंभ में वह इराण के पास वाले प्रदेशों में ही बसे थे। परंतु इस्लाम का बढता दायरा उन्हे वहाँ से भी उखाडता रहा और अंत में उन्होने भारतभूमि पर पाँव रखें।
माना जाता है कि आठवीं अथवा दसवीं सदी में पारसीयों का प्रथम आगमन भारत में हुआ था।
गुजरात के तट पर आकर उन्होने वहाँ के राजा से आश्रय देने का अनुरोध किया।
इस संबध में कहानी बताई जाती हैं कि राजा ने उनसे पूछा की वह किस प्रकार वहाँ के समाज में रहेंगे ?
तब पारसीयों के प्रमुख ने दो अलग कटोरियों में दूध और शक्कर देने का अनुरोध किया। उन्होने दूध की कटोरी में शक्कर मिलाकर चम्मच से घोल दिया और बताया की वह इस प्रकार यहाँ के समाज में घुलमिलकर मधुरता बढाएंगे।
प्रसन्न होकर राजा ने उन्हे यहाँ बसने की अनुमति प्रदान की और केवल दो शर्ते रखी -
पहली शर्त की उन्हे यहाँ की भाषा (गुजराती) स्वीकार करनी होगी और महिलाओं को यहाँ के वस्त्र (गुजराती पद्धति की साडी) अपनाने होंगे।
आज भी भारतीय पारसीयों की मातृभाषा गुजराती हैं और महिलाएँ गुजराती पद्धति से साडी बांधती हैं।
पारसीयों के साथ इस देश में किए जानेवाले उदार व्यवहार की वार्ता उनकी मूल भूमि तक पँहुची होंगी क्योंकि इसके पश्चात और समूह भारत में आते रहे।
उल्लेखनीय हैं कि पारसी समुदाय भारत के प्रति कृतज्ञ रहा हैं। उन्होने भारत की आर्थिक - सामाजिक उन्नति में योगदान दिया और इसी देश को अपनी मातृभूमि का स्थान देकर अपनी निष्ठा समर्पित की।
ज्यू और पारसीयों के इस देश में आनंदपूर्वक बसने का इतिहास ही सनातनी हिंदुओं के उदारमतवाद की गाथा का प्रमाण हैं। अपनी मातृभूमी - धर्मभूमी - प्रिय भूमी की बदलती परिस्थितियों से निराश होकर वह एक ऐसे देश में रच - बस गए जहाँ के भिन्न धर्मियों ने उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया और उन्हे फलने - फूलने के लिए सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई।
अगले भागों में हम भारत से सामूहिक स्थलांतर करनेवाले हिंदुओं के इतिहास और वर्तमान पर विचार करेंगे।
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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