#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १९१ - शुक्रवार दि. १९.०१.२०२४

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

भारत से निकलकर रोमानी समूह अफगाणिस्तान और पर्शिया के मार्ग से आर्मेनिया पँहुचे। कुछ छोटे बडे समूहों ने इस मार्ग में पडनेवाले प्रदेशों में भी वास कर लिया।

अनुमान है कि मुख्यतः आर्मेनिया से उन समूहों का विघटन प्रारंभ हुआ। भिन्न भिन्न दिशाएँ चुनकर वह विश्व के अनेक देशों में फैलने लगे।

रोमानी समुदाय के लोग कुशल श्रमजीवी थे। वह लुहारकाम व मोची काम में निपुण थे, धातु के बर्तन बनाते थे और बर्तनो में कलाई (Tin electroplating) करते थे। वह लकडी पर नकाशी का काम और माली का काम करते थे और बेंत से टोकरियाँ भी बनाते थे। इस समुदाय में जडीबुटीयों की औषधी के ज्ञान की भी परंपरा थी इसलिए वह इस पद्धति से उपचार भी करते थे। गायन और नृत्य उनकी जीवनशैली का अभिन्न अंग था इसलिए वह व्यवसाय के रूप में मनोरंजन का काम भी करते थे।

रोमानी समुदाय ने प्रत्येक प्रदेश में अपने निवासकाल में उपरोल्लिखित कौशल पर आधारित व्यवसाय किए। भारत में भी वह बुद्धीजीवी वर्ग से नहीं थे, कदाचित इसिलिए परदेस जाकर भी वह श्रम आधारित कार्य ही करते रहें। 

प्रत्येक समाज में ऐसा श्रमजीवी वर्ग होता हैं और समाजव्यवस्था लिए वह अत्यावश्यक भी होता है। किंतु साधारणतः इस वर्ग को समाज में प्रतिष्ठा - सम्मान नहीं मिलता हैं।

रोमानी तो फिर 'परदेसी' थे , 'बाहरवाले' थे। इसलिए उन्हे प्रत्येक स्थान पर उपेक्षा की दृष्टी से ही देखा गया। कदाचित रोमानियों ने भी अपनी अशिक्षितता के कारण संकोच किया होगा। इसलिए वह प्रस्थापित समाज से अलग अपनी पृथक वसाहत बनाकर रहते थे। उनकी प्रथा - परंपराएँ स्थानिक समाज से पूर्णतः भिन्न हुआ करती थी और उनके पालन के लिए वह अत्यंत आग्रही हुआ करते थे। इसलिए स्थानिक समाज में घुलकर उन्नति का मार्ग उनके लिए कभी बना ही नहीं। 

अपनी भूमी से उखडकर आए इस समुदाय की हिचकिचाहट एक और हैं परंतु दुखद तथ्य हैं कि प्रत्येक प्रदेश में उन्हे चोरउच्चका माना गया, वह गुंडागर्दी, अपहरण और वेश्यावृत्ती करते हैं यह आरोप उनपर लगाए गए। 
मध्ययुग में यह भी माना जाता था कि उनके कारण प्लेग जैसे संक्रामक रोग फैलते हैं। ऐसे में उन्हे नौकरी देने में हर कोई झिझकता था और हारकर उन्हे उन्हे अपने परंपरागत व्यवसाय से ही जीवनयापन करना पडता था।

रोमानी महिलाओं की नसबंदी उन्हे अंधेरे में रखकर किए जाने के उदाहरण हैं।
रोमानी समुदाय के अधिवास स्थान (बस्ती) को शहर अथवा गाँव की जनता से दूर रखे जाते हैं। दोनो के बीच उँची उँची दिवार बनाकर रोमानियों को अपमानित किया गया हैं।
उन्हे वंशभेद का भी सामना करना पडा है।
रोमानी बच्चों के लिए अलग से पाठशालाएँ रखी गई अर्थात सामान्य जन के साथ पढने के उनके अधिकार को नकारा गया।
कई बार उन्हे केवल 'विशेष बच्चों' की पाठशाला में पढने को बाध्य किया गया।

रोमानियों के साथ हुए अन्याय ने आगे और विकराल रूप लिया।

उन्हे गुलाम बनाकर दूसरे देशों में भेजा जाता था। पोर्तुगाल से इस प्रकार ब्राजिल भेजे गए रोमानियों की संख्या इतनी अधिक थी की उनके वंशजों से अब वहाँ विश्व का बहुत बडा रोमानी समुदाय बन गया है। फ्रान्स और स्पेन भी वसाहतवादी देश थे जो विश्व के अनेक देशों में सत्ता हथियाए बैठे थे। उन्होने भी इसी प्रकार रोमानियों को गुलामी के लिए अलग अलग देशों में भेज दिया।

रोमानियों पर हुए अत्याचारों में वंशविच्छेद के प्रयत्नों के दुखद तार भी जुडे है।
दूसरे महायुद्ध में हिटलर द्वारा प्रेरित ज्यू समुदाय के साथ अन्य भी अनेक वर्गों के वंशविच्छेद की योजना बनाई गई थी। परंतु अशिक्षित रोमानी समाज अपनी दुखद गाथा विश्व के सामने नहीं ला पाया और निरपराध रोमानियों की निर्मम हत्या के विषय में वैसी जानकारी सामने नहीं आयी जैसी ज्यू धर्मियों के विषय में मिल पायी हैं।

आज भी रोमानी समाज को ना प्रतिष्ठा मिल पायी हैं ना आदर अथवा सम्मान ! रोमनियों का निवास जहाँ भी हैं, समुदाय के रूप में  हाशिए (margin) पर रहना उनकी विवशता बनी हुई हैं।

भारत में अतिथी बनकर आए ज्यू और पारसीयों के साथ इस देश में हुआ व्यवहार और भारत से स्थलांतरित हिंदुओं के साथ हुआ दुर्व्यवहार हमारी सनातन संस्कृती पर प्रकाश डालता है जिसपर हम अगले भाग में विचार करेंगे।

गर्व से कहे👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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