#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १९३ - बुधवार दि. २४.०१.२०२४

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

'अति सर्वत्र वर्जयेत' यह हम सब जानते है। 
अर्थ है कि मर्यादा का पालन और सीमा बांधना आवश्यक है।
भावनाओं में बहकर ना तो निर्णय लेने चाहिए ना ही कृति करनी चाहिए।
और इस उपदेश का पालन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में करना चाहिए, मानवी जीवन का कोई भी अंग इसके लिए अपवाद नहीं हैं।
अपने व्यक्तिगत मत इतने अधिक नहीं खींचने चाहिए जिससे औरों को असुविधा हो अथवा उनपर अन्याय हो...
अपना व्यवसाय / नौकरी और कौटुंबिक जीवन इनमें ऐसी मर्यादा का पालन करना चाहिए ताकि वह एकदूसरे पर हावी ना हो...
अपनी आदतों पर अंकुश रखना चाहिए ताकि हम उन आदतों के सेवक ना बन जाए...

ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। इसमें मूल विचार यहीं हैं कि जीवन में संतुलन होना चाहिए।

परंतु बात जब हमारे धर्म की होती है तब इस सीमा को पहचानना, उसका कारण समझना और उसका पालन करना संवेदनशील विषय हो जाता है।

'धर्म' यह अत्यंत गंभीरता से लेने की बात है !
क्योंकि कट्टरता का अतिरेक धर्म के मौलिक तत्वों से दूर ले जाता हैं और इस संबंध में अति उदारता से धर्मच्युत होने का भय होता है।

फिर अन्य धर्मों के प्रति अनुदार भावना निंदनीय है किंतु अन्य धर्मों के प्रति अतिरिक्त सहिष्णुता अथवा प्रेम स्वधर्म पर आँच का कारण भी बन सकती हैं !

प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थिति और उसका परिवेश (आसपास का वातावरण = environment) भिन्न होता है। इसलिए धार्मिक सहिष्णुता, धर्माचरण और धर्मबंधन संबंधी निर्णय गहराई से सोचकर ही लेने चाहिए।

इस संबंध में श्रीमद् भगवद् गीता का उपदेश शिरोधार्ह होना चाहिए। यद्यपि गीता का उपदेश शब्दों से ध्वनित होनेवाले अर्थ से भी विशाल हैं किंतु कम से कम शब्दार्थ का शब्दशः पालन तो हमारा कर्तव्य है ही !

इसलिए अपने अज्ञान और दायित्वहीनता (irresponsibility) को धार्मिक सहिष्णुता, उदारता आदि के आवरण में लपेटकर धर्मनाश का पातक ना करते हुए हमें भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश का ध्यान रखना होगा कि -
"स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावह"
(सारांश : स्वधर्म का पालन करते करते मृत्यु भी स्वीकार करनी चाहिए क्योंकि परधर्म का पालन सर्वथा हानिकारक है)।

गर्व से कहे👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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