#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १९४ - शुक्रवार दि. २६.०१.२०२४

🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩 

कहा जाता है कि 'मनुष्य जीवनभर विद्यार्थी होता है'। तात्पर्य है कि अच्छी बातें आत्मसात करने के लिए आयु का बंधन नहीं होना चाहिए। 

यह उक्ति धर्म के लिए भी लागू है। सनातनी हिंदु घरों में पूजाघर होता है। उत्सव - त्योहार मनाए जाते है।
किंतु क्या यह पर्याप्त है ?
यद्यपि तुलना करना अनावश्यक भी है और यह असमाधान का कारण भी हो सकता है।
किंतु कदाचित धर्म के संबंध में तुलना से हमारी कमीयों पर प्रकाश पड सकता है और हम अपनी गलतियाँ सुधार सकते हैं।

इसलिए धर्मपालन के संबंध में अन्य धर्मियों के साथ तुलना से हम भी कुछ सीख सकते हैं !

कुछ अन्य धर्मों में धर्मकार्य (कर्मकांड !) के संबंध में कडे नियम होते हैं। इनका पालन ना करनेवाले की कठोर आलोचना की जाती हैं अथवा वह सम्मान से वंचित रहते हैं।
हम ऐसे उदाहरण को सामने रखेंगे और हमारी सोच की तुलना उनसे करेंगे।

उदाहरण के लिए ख्रिश्चन धर्मिय प्रत्येक रविवार को Mass (प्रार्थना) के लिए चर्च में जाते हैं। उनके धार्मिक जीवन का यह अभिन्न अंग है। 
नवजात शिशु का ख्रिश्चन धर्म में औपचारिक प्रवेश Baptism इस विधि से होता हैं।
मृत्यु पश्चात Funeral Mass की पद्धति का भी वह पालन करते है।

मुस्लिम धर्म में 'पाँच वक्त की नमाज (फजर, जोहर, असर, मगरीब और इशा)' पढने का अत्याधिक महत्व हैं। जुमे को (शुक्रवार) जोहर की नमाज के समय 'जुमे की नमाज' पढी जाती हैं जिसमें खुतबा (उपदेश) होता है। इसलिए 'जुमे की नमाज' अकेले में नहीं पढी जाती हैं, इसे धर्मबंधुओं के साथ ही पढ़ा जाता हैं। नमाज की पद्धति के नियम भी कडे होते हैं और धार्मिक मुस्लिम इनका अवश्य पालन करते हैं।
मुस्लिम समाज में 'पाँच वक्त के नमाजी' को अत्यंत आदरणीय माना जाता है।
'हज (मक्का की) यात्रा' करना भी मुस्लिम व्यक्ति का कर्तव्य माना जाता हैं। इसे मुस्लिम माह के १२ वें माह के नियत दिनों में किया जाता है। मुस्लिम समाज में हजयात्रा कर आए स्त्री - पुरुष अत्यंत सम्माननीय होते हैं। 
इसके अतिरिक्त जब भी सुविधा हो तब मक्का की यात्रा करने को 'उमरा' कहा जाता हैं और यह अत्यंत पुण्य का कार्य माना जाता हैं।
रमादान के माह में रोजे रखना ( विशिष्ट पद्धति का उपवास) भी महत्वपूर्ण हैं।

पारसीयों की अग्यारी (अग्निदेवता का पूजाघर = मंदिर) में गैर पारसीयों का प्रवेश वर्जित होता हैं। बच्चे के पारसी धर्म में औपचारिक प्रवेश का विधि (नवज्योत) अत्यंत श्रद्धा से संपन्न किया जाता हैं।
विवाह से लेकर अंत्येष्टि तक पारसीयों के निश्चित नियम - निर्बंध होते हैं और इनका पालन पारसीयों के लिए सामान्य बात हैं !
आधुनिक काल में व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण चुनिंदा धार्मिक नियमों पर पुनर्विचार कर उनकी समयानुकूल व्याख्या की गई है (changes = बदलाव)।
परंतु उल्लेखनीय बात यह हैं कि यह सब पारसी समुदाय ने समूह के रूप में धर्मगुरुओं के समक्ष तथ्यों को प्रस्तुत कर 'धर्मसभा के निर्णय' इस रूप में किया हैं, पारसी धर्म के लोगों ने स्वयं निर्णय लेकर अपने व्यक्तिगत जीवन में इसे लागू नहीं किया हैं !

दि. १०.०१.२०२४ के भाग १८७ में हमने ज्यू धर्मियों की प्रथा - परंपराओं पर विचार किया था। उनका पालन आज भी श्रद्धा से किया जाता है।
इसमें ज्यू (यहुदी) नियम के अनुसार एक अकेले व्यक्ति द्वारा प्रार्थना करना भी मान्य है किंतु प्रार्थना के कुछ भागों के लिए १० यहुदीओं की उपस्थिति अनिवार्य हैं। इस प्रार्थना का नेतृत्व रब्बी / राबी (यहुदी धर्मगुरू) करते हैं। 'तोराह (= यहुदी बाईबल)' पढने का भी यहुदी धर्म में विशेष महत्व हैं।

आज हमने विभिन्न धर्मों के धार्मिक कर्मकांडों पर विचार किया।
अगले भागों में हम सनातनी हिंदु धर्मियों के धार्मिक कर्मकांडों संबधी 'तथाकथित' आधुनिक विचारधारा, उसके परिणाम और उनपर उपाय इसपर विचार करेंगे।

गर्व से कहे👇🏼 
हिंदु धर्म की जय 🚩 
भारतमाता की जय 🇮🇳

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