#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १९६ - बुधवार दि.३१.०१.२०२४
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
पिछले भाग में हमने देखा था की जीवन के अनेक क्षेत्रों को आधुनिक काल के अनुरूप बनाना अपरिहार्य हैं।
किंतु इन बदलावों के लिए चिंतन आवश्यक हैं। क्षणकाल के लाभ के लिए अनंतकाल की हानि टालने की यह पहली शर्त हैं !
दुखद तथ्य यह हैं कि अधिकांश हिंदु आधुनिकता नामक बवंडर की चपेट में आकर अपनी चिंतनशीलता भूल गए हैं।
इसके दृश्य परिणाम यह हैं-
धर्मकृत्यों को अनावश्यक कर्मकांड बताकर टाला जाता हैं। अनेक हिंदुओं को देवदर्शन, पूजा, अनुष्ठान आदी उतना आवश्यक नहीं लगता हैं, स्नान करत समय और भोजन से पूर्व ईश्वर का नाम लेने की पद्धति अब लुप्त हो चली है। इसे यदि 'अनावश्यक कर्मकांड' कहा जाने लगे तो हम हमारे धर्म से दूर ही जाएंगे।
इसके परिणामों पर प्रत्येक व्यक्ति को गहरा विचार करना चाहिए ❗
पर्व और त्योहार उत्सव बनकर रह जाते हैं। नए कपडे, स्वादिष्ट भोजन और अनेक उत्सवी आयोजन धूमधाम से किए जाते हैं। किंतु उन त्योहारों का मूल वैज्ञानिक विचार उपेक्षित रह जाता हैं। इसी कारण सनातनी हिंदु परंपराओं के प्रति अज्ञान बढ़ता हैं। ऐसे में दूसरे धर्मों के लोग यदि अपनी परंपराओं के कारण बताने लगे तो हमारे मन में अपने धर्म को लेकर हीनभावना (inferiority complex) बन सकती है❗
जिस प्रकार न्यायालय, सेनादल, नगरपालिकाएँ आदी चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है उसी प्रकार वेदशाला, मंदिर आदि के लिए भी धन की आवश्यकता होती है। और हमारे धर्म की इन महत्वपूर्ण संस्थाओं के लिए धन कहाँ से आएगा ?आधुनिक जीवनशैली के लिए अनेक हिंदु पैसा बहाते हैं परंतु मंदीर और वेदशालाओं के लिए योगदान देने की आवश्यकता पर विचार नहीं करते है। मुस्लिम धर्मी व्यक्ति अपने उत्पन्न का विशिष्ट भाग समाजोपयोगी कार्यों के लिए दान देते हैं जिसे 'जकात' कहा जाता है। हमें उनकी इस पद्धति का अनुकरण करना चाहिए ❗
आजकल का जीवन व्यस्त और भागदौडवाला है। प्रातः काम के लिए शीघ्र घर से निकलना भी आवश्यक होता हैं। प्रतिदिन पूजा ना करने के लिए यही कारण बताया जाता है और घर में केवल छुट्टी के दिन ही पूजा की जाती है। परंतु इस व्यस्त जीवन में भी हम प्रतिदिन चाय - कॉफी पीते हैं, कामपर जाते समय टिफिन भरते हैं और अच्छे से तैयार भी होते हैं। ऐसे में छोटीसी पूजा करने का नियम भी बनाया जा सकता है ! कम समय ही सही किंतु ईश्वर की आराधना को अपने दैनंदिन जीवन का भाग बनाना चाहिए। अन्यथा क्या अगली पिढी श्रद्धालु हिंदु रह पाएगी ❓
घरों में यज्ञयाग, होम हवन तो आधुनिक काल में कम हुआ ही हैं। भागदौड भरे आपाधापी के जीवन में इसका समर्थन भी कभी कभी हो सकता है। किंतु मन की श्रद्धा कायम रखनी चाहिए। अन्यथा हमारे व्यवहार में अतार्किकता आती हैं।
उदाहरण के लिए आजकल Registered Marriage का समर्थन किया जाता है। हिंदु विवाह विधि के लिए अधिक समय की आवश्यकता और उसके लिए आवश्यक व्यय (पुरोहितजी की दक्षिणा और सामग्री की लंबी सूची) यह कारण बताए जाते हैं जो एकदम सटीक और समर्थनीय लगते हैं। किंतु हमें इसपर सोचना चाहिए। विवाह संबंधी बाकी कार्यक्रम तो प्रचलित पद्धतिनुसार ही किए जाते हैं जैसे कपडे, अलंकार, अन्य सामग्री खरीदने के लिए व्यय करना और समय देना, सगेसंबधियों को न्योतकर समारोह करना, उसके लिए वर - वधू की तैयारी, Reception पर व्यय आदि। अनेकों बार ऐसे विवाह समारोहों में कुलदेवता की पूजा, संगीत, मेहंदी आदि कार्यक्रम नहीं किए जाते हैं किंत Get-together के नामपर Cocktail Party, Pool Party आदि का चलन बढ रहा हैं। ऐसे में केवल सनातन हिंदु धर्म पद्धति के अनुसार विवाह के लिए धार्मिक विधि का समय और व्यय बचाना इसके औचित्य पर अवश्य विचार करें❗
इस प्रकार के व्यवहार के कारण हमारे प्रिय सनातन हिंदु धर्म की क्या हानि हो रहीं है इसपर हम अगले भाग में विचार करेंगे।
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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