#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १८७ - बुधवार दि. १०.०१.२०२४
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
भारत में अतिथि के रूप में विनम्रतापूर्वक आए समुदायों में ज्यू (यहुदी) धर्मियों का उल्लेख किया जाता हैं।
वह आक्रमक नहीं थे !
उन्होने यहाँ का पुरातन धर्म और सभ्यता को कुचलकर, इस देश के निवासियों का दमन कर, उनपर अपने आचार - विचार और धर्म थोपकर फिर भी भारतीयों को अपने सेवक (गुलाम) बनाने का निकृष्ट विचार नहीं रखा था !
स्पष्ट हैं की उनकी अपनी पुरातन भूमि में रहना उन्हे किन्ही कारणों से कठिन हो रहा होगा। कदाचित उस स्थिति के पलटने की आशा की किरण वहाँ नहीं रही होगी, इसलिए उन्होने समूह के रूप में दूर के देश में स्थलांतर का निर्णय लिया होगा।
यहाँ पँहुंचने पर उन्होंने आश्रय देने का विनम्र अनुरोध किया था।
ज्यू धर्मियों के भारत में आगमन काल संबधी प्रमाण निश्चित रुप में उपलब्ध नहीं है। यह माना जाता है कि लक्षणीय संख्या में यह समूह भारत में प्रथम पाँचवी अथवा छठी सदी में आया था। वह सागरी मार्ग से आकर केरल के कोचीन समुद्रतट पर उतरे थे। इन्हें 'कोचीन ज्यू' कहा जाता है।
ज्यू धर्मियों का एक और समूह महाराष्ट्र के कोंकण समुद्र तट पर आकर वहाँ बस गया। यह 'बेने इजराइली' कहलाते है। कोंकण में इनके आगमन काल के संबंध में अभ्यासकों में मतभेद हैं। साधारण मान्यता यह है कि कोंकण किनारे के निकट उनका जहाज डूब गया था और कुछ ही यात्री जीवित बच पाए थे।
जहाज डूबने के कारण उनके पास धर्मग्रंथ तक नहीं बचे थे परंतु वह अपनी प्रथा - परंपराओं का पालन करते रहे जैसे -
ज्यू धर्मीय शनिवार को काम नहीं करते हैं और चूल्हा नहीं जलाते हैं ( इस कारण से महाराष्ट्र में इन्हे 'शनिवार तेली' भी कहते थे क्योंकि तेल छलकने का कार्य करनेवाला यह समुदाय शनिवार को कामकाज की छुट्टी का दिन मानता था)।
कोंकण में इनका काम मुख्यतः तेल छलकने का था किंतु शनिवार को अर्थात सब्बाथ के दिन वह छुट्टी करते थे।
ज्यू धर्मिय केवल 'कोशेर मांस' खाते हैं अर्थात किन प्राणियों का मांस वर्जित है इसके नियम होते हैं। जिन प्राणियों का मांस खाया जाता हैं उसके लिए भी कुछ नियम हैं।
मांस और दुग्धजन्य पदार्थ के बर्तन अलग रखना यहुदीओं के लिए आवश्यक है।
समुद्री जीवो में शल्कवाली (scales) मछलियाँ ही खाई जा सकती है। वह मछली को विशिष्ट प्रकार से ही काटते हैं। उनके लिए अनेक समुद्री जीव खाने में वर्जित हैं।
आनेवाली पिढीयाँ धीरे धीरे अपना धर्मपरिचय खो बैठी किंतु परंपराओं का पालन तब भी हो रहा था। मौखिक परंपरा से सिखाई गई प्रार्थना भी वह करते थे।
अन्य ज्यू धर्मियों का संपर्क जब इस समुदाय से हुआ तब उन्होंने अपनी प्रथा - परंपराओं की समानता को पहचाना और इस समुदाय को 'ज्यू धर्मीय' यह मान्यता प्रदान की।
इसके अतिरिक्त सत्रहवी शताब्दी में तत्कालीन मद्रास में भी बड़ी संख्या में बाहर देश से आए हुए ज्यू बस गए थे।
भारत के हिंदुओं ने (राजकर्ता और प्रजा दोनों ने) इनके आगमन के समय अपने विशाल हृदय और सहिष्णु विचारधारा का परिचय दिया था। वे सब भिन्न धर्म के अनुयायी थे, फिर भी उन्हे इस भूमि में निवास के लिए स्थान उपलब्ध कराया गया, उन्हे अपने प्रार्थनास्थल बनाने की और उनके धर्म के अनुसार आचरण करने अनुमति दी गई।
१९४८ में ज्यू धर्मियों का राष्ट्र इस्त्राएल की स्थापना हुई। इस राष्ट्र की घटना के अनुसार ज्यू धर्मिय विश्व के किसी भी भाग में निवास कर सकते है, किंतु प्रथम वह इस्त्राएल के नागरिक ही होते है। इसलिए प्रत्येक ज्यू धर्मी व्यक्ति को बिना किसी शर्त के इस्त्राएल में बसने का अधिकार है।
स्वाभाविक था कि अपनी प्रिय धर्मभूमि में कायम निवास के लिए अनेक ज्यू धर्मियों ने इस्त्राएल में स्थलांतर किया। यह अभी भी हो रहा है।
अब स्थिति यह हैं कि इनमें से अनेक ज्यू धर्मिय उनके साथ भूतकाल में हुए व्यवहार से इतने दुखी ओर पिडित हैं कि अपने उस भूतकाल को वह भूलना चाहते हैं !
भेदभाव, अत्याचार, कष्ट और अपमान के अनुभवों की मानसिक पीडा उनके लिए इतनी असह्य हैं कि वह अपने पुराने देश की ओर पलटकर देखना भी नहीं चाहते हैं।
आनंद और अभिमान की बात यह हैं कि इसके ठीक उल्टी स्थिति भारत से इस्त्रायल चले गए ज्यू धर्मियों की हैं। धर्मभूमि का आमंत्रण स्वीकारने को कर्तव्य मानकर वह इस्त्रायल अवश्य चले गए, किंतु भारत को वैसे ही स्मरण करते हैं जैसें ब्याहता बेटियाँ अपने मायके के लिए आतुर होती हैं। क्योंकि हमारे देश में उन्हे अपनत्व और सम्मान मिला था, समाज ने उन्हे प्रेम और आदर से स्वीकार किया था और उनके धर्म की रक्षा में योगदान भी दिया था।
सनातनी हिंदु संस्कृति की महानता का यह मनोज्ञ पहलू है !
अगले भाग में हम भारत में स्थलांतरित होकर आए पारसीयों के संबध में विचार करेंगे।
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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