#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १९७ - शुक्रवार दि.०२.०२.२०२४
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
प्राचीन निधि (treasure) मिलने का भाग्य सबका नहीं होता।
हम हिंदुओं का हैं !
अत्यंत पुरातन - गौरवशाली हिंदु परंपरा के हम भाग्यशाली लाभकर्ता हैं !
इसलिए हमारा कर्तव्य हैं की हम इस निधि का जतन करें और उसे आनेवाली पिढियों को सौंपे !
किंतु सनातनी हिंदुओं की युवा पिढी में अनेक लोगों को हमारे धर्म का इतिहास ज्ञात नहीं हैं। अथवा जो जानकारी है वह बस कच्ची पक्की जैसी तैसी हैं, निश्चित रूप से वह बहुत विषयों पर नहीं जानते हैं।
परिणामतः उनकी अपने ही धर्म पर आस्था कम हो रहीं हैं। सनातन हिंदु धर्म की विज्ञान पर आधारित परंपराएँ, पर्यावरणपूरक पद्धतियाँ, मानसशास्त्रीय अभ्यासपर आधारित धर्मकार्य इस उज्वल पक्ष को वह जानते ही नहीं हैं !
(इस संबंध में हमने दि. १५.१२.२०२३ से दि. ०१.०१.२०२४ भाग १७६ से १८५ तक 'उपासना पद्धति का महत्व' इस श्रृंखला में विचार किया था।
परंतु अन्य धर्मियों की युवा पिढी पर्याप्त भिन्न हैं। उन समाजो में धर्मों में आस्था भी हैं और धार्मिक परंपराओं का निर्वाह भी प्रायः कट्टरता से ही किया जाता है यद्यपि उन सब का जीवन भी भागदौडवाले आधुनिक काल में ही है ❗
इसलिए अन्य अनेक धर्मों के युवा पिढी को अपने धर्म के विषय में भरपूर जानकारी होती है। किसी भी चर्चा में धर्म के संबंध जब वह बोलते हैं तब हमारी हिंदु युवा पिढी के ज्ञान के खोखलेपन के कारण उन्हे न्यूनता की भावना (Inferiority complex) होती है। वह अपने ही धर्म को निम्न स्तर का मानने लगते हैं।
ऐसे में उनकी विचारशक्ति कुंठित होकर मार्ग से भटकने की संभावना बन जाती हैं ❗
नास्तिक होना एक बात है किंतु अपने धर्म का ज्ञान नहीं होने के कारण दूसर धर्म की ओर आकर्षित होना अत्यंत लज्जास्पद स्थिति हैं !
दूसरे धर्मों का सम्मान करना, उनकी प्रथा - परंपराओं के लिए सहिष्णु होना समझा जा सकता हैं किंतु अज्ञान के कारण अपने ही धर्म का अनादर घोर अपराध हैं !
परंतु हर प्रश्न का उत्तर होता ही है। कहावत है कि 'Stitch in time, saves nine' !
मराठी कहावत है कि 'तहान लागल्यावर विहिर खणू नये' (प्यास लगनेपर कुआँ नही खोदते)।
यह धर्मशिक्षा के लिए भी लागू है ❗
हजारो वर्ष के इतिहास से मंडित हमारे धर्म व संस्कृती के संवर्धन का मार्ग है धर्म के सत्य स्वरूप के ज्ञान के साथ धर्मशिक्षा देना !
और पिढी दर पिढी उसे आगे बढ़ाना !
सनातन धर्म के प्रति अगली पिढियों में चेतना, श्रद्धा व सम्मान जागृत करने का दायित्व हम प्रौढ पिढी अर्थात मातापिता और उनसे भी वरिष्ठ पिढी का हैं !
यह कैसे किया जा सकता हैं इस संबंध में हम अगले भागों में विचार करेंगे।
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
- सौ. गौरी मिलिंद देशपांडे
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