#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १९८ - सोमवार दि.०५.०२.२०२४
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
संस्कार करने की कला : भाग १
भारत की राज्यघटना प्रत्येक व्यक्ती को अपने अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देती है।
इसलिए अपने बच्चोंपर, नातीपोतोंपर धार्मिक संस्कार करना हमारा अधिकार हैं और समाजहित के लिए विचारपूर्वक धार्मिक संस्कर करना हमारा दायित्व (responsibility) भी हैं❗
यह दायित्व किस प्रकार पूर्ण किया जा सकता है इसपर हम विस्तारपूर्वक विचार करेंगे।
प्रथमतः हम जिन कार्यो में विशेष समय / कष्ट / धन की आवश्यकता नहीं होती हैं उनपर विचार करेंगे।
अपने दैनंदिन जीवन में कुछ आदतों को ढालने भर से यह कार्य किया जा सकता हैं। उदाहरणार्थ -
1) हर दिन प्रातः उठनेपर घर में अपने अपने छोटे - बडे पूजाघर के सामने खडे होकर ईश्वर को नमन करें। जो हमे अच्छा लगता हो ऐसा कम से कम एक श्लोक अवश्य बोलें और मस्तक झुकाकर नमन करें।
बच्चे आपको देखते हैं !
२) काम के लिए घर से बाहर जाते समय और लंबी यात्रा पर जाते समय भगवान को प्रणाम कर घर से निकलें।
बच्चे आपको देखते हैं !
३) आंगन में या गमले में तुलसी का पौधा लगाए। उसे प्रति दिन पानी दें।
बच्चे आपको देखते हैं !
४) संध्या समय पूजाघर में दिया और अगरबत्ती जलाएं। तुलसी के पौधे के सामने भी दिया जलाए। इस समय आपके बच्चों को साथ लें और तुलसीमाता को प्रणाम करवाएं।
बच्चे आपको देखते है !
५) बच्चे थोडे बडे होंगे तब उन्हे तुलसीमाता के सामने दिया रखकर आने के लिए कहें।
बच्चे यह खुशी से करते हैं।
६) शनिवार या रविवार को बाजार तो जाना ही पडता हैं। प्रातः उठकर आपस में उत्साह से बात करें की 'पहले हम मंदिर जाएंगे, फिर बाजार में....'। मंदिर जाते समय भोग लगाने के लिए बच्चों के मनपसंद पेडे - बर्फी ले जाए।
कुछ सालों बाद उन पेडे बर्फी का नहीं, मंदिर में दर्शन का मोह बच्चों के मन में अवश्य होगा !
७) जीवन की गति अब बहुत तेज है। पूजापाठ - जाप - अनुष्ठान के लिए कम समय मिलता है।
है ना ?
कोई बात नहीं...
जाप का यंत्र आजकल मिलता है, जैसे 'ॐ नमः शिवाय', 'श्रीराम जयराम जयजयराम' आदि। ऐसा यंत्र खरीदकर लाए और प्रतिदिन प्रातः उठनेपर और संध्यासमय आधा घंटा उसे लगाए। You Tube पर भी ऐसे जाप उपलब्ध है। हम समय निकालकर स्वयं जाप कर नहीं सकते हैं परंतु जब भी हम घर में हो तो थोडी देर सुन तो सकते हैं।
याद रखें, बच्चे भी सुनते हैं !
यह सब बहुत छोटे प्रयत्न हैं किंतु बच्चों के मन में ईश्वर के प्रति आस्था और श्रद्धा प्रतिष्ठापित करने के लिए सहाय्यकारी है।
यह समझना आवश्यक है कि युवा होने पर अचानक से हमारे बच्चे धार्मिक नहीं हो जाएंगे। इसके लिए प्रयत्न बचपन से ही करने पडते हैं और माता पिता और अन्य कुटुंबियों को ही करने पडते हैं।
इस विषय में अन्य धर्मियों से सीख लेने में भी कोई बुराई नहीं है।
ख्रिश्चन बच्चे रविवार को प्रार्थना (Mass) के लिए चर्च जाते हैं।
मुस्लिम बच्चे विशिष्ट टोपी पहनकर मस्जिद में नमाज के लिए जाते हैं और अनेक बच्चियाँ हिजाब करती हैं।
प्रत्येक व्यक्ति अपनी धार्मिक आस्थानुसार व्यवहार करता है। इसलिए हमें अन्य धर्मियों की परंपराओं का अनुकरण करने की आवश्यकता नहीं हैं। परंतु 'अपने धर्म के प्रति आस्था' इस भावना का अनुकरण करने के विषय में अवश्य सोचें !
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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