#हिंदु-धर्मसंस्कार🚩: भाग १९९ - बुधवार दि.०७.०२.२०२४
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
संस्कार करने की कला: भाग २
एक कहावत है कि 'दादा गुठली बोएंगे तो पोते आम खाएंगे' अर्थात, यदि आपको भविष्य में सुखद अनुभव चाहिए होंगे तो वर्तमान समय में कुछ पहल करनी होगी, कुछ तो उपक्रम करने होंगे।
पिछले भाग में हमने देखा था की अपनी दैनंदिन दिनचर्या में कुछ आदतें ढालना सरल हैं क्योंकी उनमें कम समय लगता हैं।
परंतु इससे आगे भी और कुछ करने की आवश्यकता है !
और यदि कोई उस प्रकार से सोचता हो तो, ऐसे उपक्रम करने में कष्ट भी हैं और असुविधा भी ! क्योंकि इसके लिए समय देना पडता हैं, आराम और मनोरंजन की कीमत चुकानी पडती हैं !
इसे हम अपने बच्चों पर धार्मिक संस्कार करने के संदर्भ में देखेंगे।
अनेक लोग सोचते हैं कि घर में पूजाघर होने से और वहाँ भगवान को हाथ जोडकर प्रणाम करने से बच्चे ईश्वर के प्रति श्रद्धावान हो जाएंगे।
वैसे तो ईश्वर निर्गुण - निराकार हैं और उनकी उपासना के लिए हाथ जोडने की भी आवश्यकता नहीं है। मन में की गई प्रार्थना, जाप सब उनतक पँहुचता हैं इसलिए पूजाघर भी आवश्यक नहीं हैं !
परंतु जैसे Ph.D. का अभ्यास शिशुवर्ग में पढनेवाले विद्यार्थी नहीं समझ पाएंगे उसी प्रकार निर्गुण - निराकार ईश्वर की उपासना सबके लिए संभव नहीं हैं। उसके लिए सद्गुरू के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक उन्नति के सोपान (सीढी) चढने होते हैं। सामान्य जनों के लिए पार्थिव रूप में स्थापित ईश्वर की पूजा यह उचित और सरल मार्ग हैं।
तो हमारी अगली पिढी को ईश्वर की ओर उन्मुख करने के लिए हमें भी पूजा, याग, व्रत, अनुष्ठान आदि करने चाहिए।
समस्याएँ वहीं बताई जाती हैं, भागदौडवाली दिनचर्या, छुट्टीयों की कमी आदि अनेक...
परंतु,
हम Trips करते है...
विवाह आदि समारोह में जाते हैं...
Get together होता है...
School / College reunion के लिए समय निकालते हैं...
बच्चों के जन्मदिन और विवाह की पाँचवी / दसवीं.... वर्षगाँठ धूमधाम से मनाते हैं...
ऐसे में हमें हमारे धर्म के लिए भी समय निकालना चाहिए! क्या किया जा सकता हैं यह हम देखेंगे -
१) वर्ष में कम से कम एक बार कुलदेवता के दर्शन के लिए जाना। जब यह संभव ना हो तो घर में ही शुभ दिन पर कुलदेवता का अभिषेक करना।
२) श्रावण मास में घर में अथवा मंदिर जाकर लघुरुद्र / महारुद्र करना।
३) दैनंदिन पूजा के अतिरिक्त अपनी सुविधा से विशेष पूजा करना जैसे सत्यनारायण की कथा, गणेश स्थापना करना, अथर्वशीर्ष का आवर्तन आयोजित करना, नवरात्री में देवी का अभिषेक करना अथवा श्रीसूक्त का आवर्तन अथवा देवी का कुंकुमार्चन करना आदि।
क्या वर्ष के २ - ३ दिन हमारे धर्मानुसार ऐसे कार्यों के लिए देना सचमुच कठिन है ?
इसके अतिरिक्त व्रत रखना भी एक सरल उपाय हैं।
प्रत्येक महिने की चतुर्थी, एकादशी इनके साथ महाशिवरात्री, देवशयनी व देवउठनी एकादशी, सावन मास के सोमवार, जन्माष्टमी आदि दिनों में उपवास करना, व्रत रखना सामान्य बात है। हरितालिका, वटसावित्री और करवाचौथ में महिलाएँ व्रत करती हैं। अनेक लोग सप्ताह में एक दिन अपने आराध्य देवता के लिए व्रत रखते हैं।
कुटुंब के सदस्य व्रत रखते हैं तब बच्चों के मन में भी गहरे किसी कोने में उस पर्व का महत्व अधोरेखित होता हैं।
यह बहुत छोटी बातें लगती हैं किंतु अपने दिनक्रम में इन सब को यदि प्रतिदिन स्थान देना हो तो मन को अत्यंत अनुशासित करना पडता हैं और संयम की भी परीक्षा होती है।
किंतु हमारे प्रिय सनातन धर्म का संरक्षण और उन्नति के लिए अगली पिढी में आवश्यक भाव जगाने के दायित्व के लिए हम इतना तो कर ही सकते हैं !
गर्व से कहे👇🏼
हिंदु धर्म की जय 🚩
भारतमाता की जय 🇮🇳
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