हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०३
🚩🚩 जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
: अध्याय १
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तू पाण्डवानीक व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्य मुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत ॥२॥
पश्चैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३॥
....................................................
दुर्योधन का व्यवहार और उसकी भाषा उद्धत है।
युद्ध के पहले दिन युद्धभूमिपर आकर वह गुरु के प्रति आदर प्रदर्शित कर उनका अभिवादन नहीं कर रहा है , वह उनका आशीर्वाद भी नहीं माँग रहा है।
द्रोणाचार्य उसके युद्धकला के गुरु है परंतु वह गुरु से व्यंगात्मक (sarcastic) पद्धति से संभाषण कर रहा है।
दुर्योधन गुरु से बात करते हुए धृष्टद्युम्न के लिए 'आपका बुद्धिमान शिष्य' कह रहा है !
वह उसे 'पाण्डवसेनापती' अथवा 'पाण्डवों का श्यालक [= साला, क्योंकी धृष्टधुम्न द्रौपदी के भ्राता (= भाई) है]' कह सकता था। किंतु वह द्रोणाचार्य का अपमान करना चाहता है। अपनी सेना के वयोवृद्ध उसे फूटी आँख नहीं सुहाते। वैसे उनके युद्धकौशल का लाभ उसे चाहिए ही है। परंतु उसके लिए वह उन्हे सम्मान नहीं देगा।
वह जानता है कि भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य इन्हे पाण्डव प्रिय है और पाण्डव भी प्रेम से अपनी सेना में उनका स्वागत करेंगे। किंतु इन सबकी अपनी अपनी बाध्यताएँ है जिनके कारण यह कौरवपक्ष को छोड नहीं पा रहें है और इसके लिए इन सबके मन में विषाद (दुख) है।
इसलिए वह द्रोणाचार्य को अपनी भाषा से डस रहा है।
धृष्टद्युम्न को हेतुपूर्वक 'आपका बुद्धिमान शिष्य' बता रहा है।
अर्थात वह एकसाथ अनेक तीर चला रहा है।
वह उनकी निष्ठा पर शंका प्रदर्शित कर रहा है कि आप के मन में तो आपके कुशल शिष्यों के लिए प्रेम है यह मै जानता हूँ (जैसे अर्जुन)। तो मेरा मन कहता है कि आपका झुकाव उनकी ओर ही होगा यद्यपि वह हमारे शत्रु है। ऐसे में आप तो अपनी पूर्ण क्षमता से उनके विरुद्ध युद्ध नहीं करेंगे ऐसी मेरी मान्यता है !
वह द्रोणाचार्य को उपालंभ (taunt) दे रहा है कि यह तो आपके प्रिय शिष्य है ना, तो देखिए अपने ज्ञानदान का परिणाम ! आज वह आपके शत्रुपक्ष में खडे है अर्थात उन्हे तो अपने गुरु का प्राण लेने की संभावना से कोई डर नहीं है, उसके लिए लज्जा नहीं है !
वह द्रोणाचार्य का मन कलुषित करने का प्रयत्न कर रहा है ।
वह यह भी संकेत दे रहा है कि आप पाण्डवपक्ष में होते तो गुरु का सम्मान प्राप्त करते परंतु मैं जानता हूँ की द्रुपद के साथ आपने जो किया है उसके पश्चात अब पाण्डवपक्ष में आपके लिए स्थान ही नहीं हैं !
द्रुपद के वीर भाई और उसके पुत्रों के रहते पाण्डवसेना को शत्रु मानना आपकी बाध्यता है !
और कौरवसेना में आप है कौन ?
राजा तो मै हुँ, और आप बस हस्तिनापुर साम्राज्य के वेतनभोगी कर्मचारी है, अतः अपने आप को श्रेष्ठ मत समझो , मेरी अर्थात राजा की आज्ञा के अनुसार बस मेरे विजय के लिए युद्ध करो !
क्रमशः
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें