हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २०७
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
अपर्याप्त तदस्माकं बलं भाषमाभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥१०॥
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अर्जुन को कृष्ण का उपदेश अभी प्रारंभ नहीं हुआ है। अतः गीता के विचार-दर्शन / तत्वज्ञान में अभी समय है।
किंतु अर्जुन का मन विचलित होने के बाद कृष्ण ने उनसे जो कहा उस की पृष्ठभूमि पहले अध्याय में दुर्योधन के कथन में भी दिखाई देती है।
पांडव सद् विचारोंवाले है, सदाचारी हैं। वह ज्ञानी है इसलिए जानते है कि अच्छाई, न्याय, दया अथवा दुष्टता, अत्याचार, अहंकार जैसे भावों का रूप सूक्ष्म है, स्थूल नहीं (अर्थात इसका कोई शरीर नहीं है)। वह जानते है कि यह सब आँखों से दिखाई नहीं देता है किंतु उसका अस्तित्व है !
अच्छाई के इन मापदंडों पर पाण्डवों का व्यवहार खरा उतरता है।
कुरूक्षेत्र पर युद्ध का कारण इस पहले अध्याय भी में दुर्योधन के दर्पयुक्त वक्तव्य में देखा जा सकता हैं।
इस श्लोक में दुर्योधन कह रहा है कि हमारी सेना पांडवों से भी अधिक है।
वह तो है ही । पांडवों की सेना ७ औक्षोहिणी है जबकि कौरवों की सेना ११ औक्षोहिणी है।
फिर दुर्योधन की सेना साधनसंपन्न है। वह हस्तिनापुर साम्राज्य की सेना है। अस्त्र-शस्त्र-रथ-हाथी-घोड़े-
भोजन व्यवस्था-शिविर (आवास)- चिकित्सक एवं अन्य कई सुविधाएँ इस सेन को प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
किंतु पांडवों के पास क्या है? हस्तिनापुर का राज्य धृतराष्ट्र ने पहले ही हडप लिया है और दुर्योधन ने इंद्रप्रस्थ का राज्य पाण्डवों को लौटाया नही है। वह तो पांडवों को सुई की नोक जितनी भी ज़मीन नहीं देगा यह उसकी प्रतिज्ञा है।
इसलिए अब पांडवों के पास अपना राज्य, घर या संपत्ति नहीं रही। वे विराटनगर में राजा विराट के राज्य में अर्थात अपने समधि के घर रह रहे हैं (पांडवों के अज्ञातवास की समाप्ति के बाद विराट की कन्या उत्तरा का विवाह अर्जुनपुत्र अभिमन्यु से हुआ था)।
पांडवों के पक्ष में आने के इच्छुक राजा भी अपेक्षाकृत कम थे। दुर्योधन के आतंक के कारण अथवा हस्तिनापुर साम्राज्य की शक्ति के भय कारण अथवा दुर्योधन के अत्याचार के परिणामस्वरूप असहाय होने के कारण पांडव पक्ष में कम राजा थे।
और दुर्योधन को तो सेना की संख्या पर आत्यंतिक विश्वास है। वह दृश्य सृष्टी से परे देख नहीं सकता है। उसे तो श्रीकृष्ण तक नहीं चाहिए थे क्योंकि उनकी प्रतिज्ञा है कि वह किसी भी पक्ष में हो परंतु युद्ध नहीं करेंगे। इसलिए दुर्योधन उनकी श्रीकृष्ण के बदले में उनकी 'नारायणी सेना' पाकर प्रसन्न है।
अपने संख्याबल के कारण दुर्योधन बड़े गर्व से कह रहा हैं कि हमारी सेना विशाल है जिसके रक्षक भीष्म है, किंतु पाण्डवों की छोटी सेना की रक्षा भीम द्वारा की जा रही है।
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क्रमश :
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