हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २०६
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥९॥
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युद्धकाल में संसाधनों का रणनीतिक नियोजन (strategic placement of resources) किया जाता है। आज भी ऐसा किया जाता है।
इसमें सभी के लिए स्थान और कार्य निर्धारित किया जाता है। वह अपनी सेना की रक्षा करना हो सकता है अथवा शत्रुसेना पर चढाई कर उससे युद्ध करना भी हो सकता है।
इसे व्यूहरचना (war stategy) कहा जाता है।
ऐसे में, यदि कोई युद्धक्षेत्र में अपना स्थान छोड़ देता है अथवा आदेशों का पालन ना करते हुए अपनी इच्छा/बुद्धि से कार्य करता है, तो उसकी अपनी सेना की हानि हो सकती है l
इसका उदाहरण छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्वराज की स्थापना के काल में मिलता है।
आदिलशाही सरदार बहलोलखान ने मराठों पर आक्रमण किया। स्वराज्य के पराक्रमी सेनापति प्रतापराव गुजर ने खान के शिविर की घेराबंदी कर डाली। खान और उसकी सेना को मार डालने के लिए यह अच्छा अवसर था। लेकिन बहलोलखान ने प्रतापराव को आश्वासन दिया कि यदि उसे छोड दिया जाए तो वह पुनः स्वराज्य पर आक्रमण नहीं करेगा।
शिवाजी महाराज का स्पष्ट आदेश था कि बहलोल खान को पूरी तरह से परास्त करना है , लेकिन ब प्रतापराव ने बहलोलखान पर विश्वास कर उसे दया दिखाकर छोड दिया। कहना ना होगा की पुनः विशाल सेना लेकर बहलोलखान ने स्वराज्यपर आक्रमण किया।
संक्षेप में, प्रतापराव ने राजा के आदेशों को गंभीरता से ना लेकर अपने मन से निर्णय लिया, जिसका मूल्य स्वराज्य को चुकाना पडा।
यही कारण है कि सेना में इस प्रकार के स्वतंत्र निर्णय लेने की अनुमति किसी को भी नहीं है।
जो भी निर्धारित रणनीति का पालन नहीं करता, उसका कोर्ट-मार्शल कर दिया जाता है और कड़ी सजा दी जाती है।
दुर्योधन द्रोणाचार्य से कह रहा है कि इस पितामह भीष्म द्वारा रचे गए व्यूह के अनुसार सभी को अपने स्थान पर रहकर युद्ध करना चाहिए और अपने सेनापति अर्थात भीष्म की रक्षा करनी चाहिए।
आइए, एक बार फिर दुर्योधन की भाषा देखिए।
द्रोणाचार्य उसके गुरु हैं..
आयु और अनुभव में ज्येष्ठ है..
उन्होंने ही कौरवों और पांडवों को युद्धकला और युद्धशास्त्र पढाया है..
परंतु दुर्योधन उन्हें मार्गदर्शन करने के लिए नहीं कह रहा है। वह तो जैसे उन्हें आदेश दे रहा है कि व वह और बाकी सब अपने-अपने स्थान पर रहकर युद्ध करें और सेनापति भीष्म की रक्षा करें!
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क्रमश:
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