हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०५

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥७॥
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय:।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदतिस्तथैव च ॥८॥
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अब दुर्योधन स्वपक्ष के योद्धाओं के नाम बता रहा है । वह द्रोणाचार्य से कह रहा है, "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, अब मैं हमारे पक्ष के प्रमुख सेनानायकों के नाम बताता हूं। आप हैं, पितामह भीष्म हैं, कर्ण हैं, युद्ध में विजयी होनेवाले कृप हैं और अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा हैं। "

दुर्योधन को संतोष है कि पांडवों के प्रति कोमल भावना रखने वाले भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य उसके पक्ष में हैं। 
अश्वत्थामा भी महान योद्धा है । 
प्रागज्योतिषपुर (गुवाहाटी) का राक्षस राजा भगदत्त उसके पक्ष में है। 
दुर्योधनने पांडवों के मामा शल्य को धोखे से अपने पक्ष में कर लिया है। 
उसने अर्जुन को युद्ध में फँसाने के लिए त्रिगर्त देश के राजा सुशर्मा का भी आगे उपयोग किया है।
परन्तु वह इन सब का नाम नहीं लेता। जैसे की दुर्योधन के लिए युद्ध करना उनका कर्तव्य ही था, तो क्यों उनका विशेष उल्लेख  किया जाए! 

उसकी भाषा देखिए .. 
वह द्रोणाचार्य को द्विजोत्तम यानी ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ कहता है, वह उन्हें गुरु कहकर संबोधित नहीं करता है और सम्मान भी नहीं देता है।

पांडव पक्ष के योद्धाओं का उल्लेख करते समय दुर्योधन 'वीर, महारथी, नरश्रेष्ठ' जैसे विशेषणों का प्रयोग करता हैं। परंतु उसके पक्ष से लडनेवालों अनेक वीरों का वह उल्लेख भी नहीं करता है अथवा बस नाम लेता है , उन का गुणवर्णन नहीं करता हैं !

संक्षेप में कहें तो दुर्योधन का स्वार्थी, अहंकारी व्यक्तित्व हर समय सामने आता है। 
वह हस्तिनापुर का साम्राज्य चाहता है और इसके लिए वह दूसरों का उपयोग करता है। 
यहाँ तक कि उन सबकी मृत्यु की संभावना भी उसके लिए इतनी नगण्य है कि वह किसी के प्रति आभार भी व्यक्त नहीं करता!
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क्रमशः
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