हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २०९
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
तस्य सञ्जनयन्हर्षः कुरवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शख्ङ्दध्मौ प्रतापवान्॥ १२॥
ततः शख्ङाश्च भेर्यश्च पणवानक गोमुखा :।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्द सुमोलो s भवत्॥ १३॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
हर्षवीत चि तों त्यास सिंह - नाद करूनियां
प्रतापी वृद्ध भीष्मांनी मोठ्यानें शंख फुंकिला
॥१२॥
तत्क्षणी शंखभेर्यादि रण वाद्ये विचित्र जी ॥
एकत्र झडली तेव्हां झाला शब्द भयंकर ॥ १३ ॥
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अब युद्ध का प्रारंभ होने वाला है । युद्धक्षेत्र में विभिन्न वाद्य बजाए जाते हैं, जैसे शंख, भेरी, नगाडे, ढोल आदि। इससे योद्धाओं और सैनिकों में वीरता का संचार होता है और वे आवेश से युद्ध करते हैंl
शांत रहकर लड़ना कठिन होता होगा। परंतु युद्धक्षेत्र के कोलाहल के साथ वाद्यों की ध्वनि के कारण सैनिकों के मन से नीति, सदाचार आदि सब कुछ नष्ट हो जाता होगा और बिना सोचे-समझे सामने वाले पर सीधे शस्त्र चलाकर उसे मृत्यु का कारण बनते समय मन काँपता नहीं होगा।
इनमें से शंख एक ऐसा वाद्ययंत्र है जिसे योद्धा स्वयं बजाता है जबकि अन्य वाद्य बजाने के लिए वादक नियुक्त किए जाते हैं।
युद्ध के प्रारंभ की सूचना देने के लिए पितामह भीष्म ने सिंह समान गर्जना कर प्रचंड शक्ति से शंख बजाकर शत्रु पक्ष को धडकानेवाला ध्वनि उत्पन्न किया है ।
भीष्म का वर्णन कितना सुन्दर है !
'महातेजस्वी वृद्ध भीष्म शंख बजा रहे हैं ' ।
कौरवों के सेनापति भीष्म!
यह कुरुकुल के सबसे वयोवृद्ध महारथी है!
उन्होंने कितना जीवन देखा हैं!
देवव्रत युवा थे, उनकी आयु विवाहयोग्य थी । तभी उनके पिता राजा शांतनु का मन धीवरकन्या सत्यवती पर आ गया। उसके पालक पिता दासराज ने शर्त रखी कि 'वह अपनी पुत्री तभी देगा जब सत्यवती के बेटे को राज्य देने का वचन राजकुल से प्राप्त होगा।'
प्रजा के परमप्रिय है भीष्म ! भविष्य में हस्तिनापुर साम्राज्य का राजा बनने के लिए गुरु परशुराम के इस प्रिय पराक्रमी शिष्य जैसा सुयोग्य राजपुत्र कौन हा सकता है !
परंतु सत्यवती के पिता चाहते है कि सत्यवती के वंशजों के मार्ग में कोई भी बाधा ना हो । इसलिए उन्होंने देवव्रत (भीष्म) से वचन लिया कि 'मैं विवाह नहीं करूँगा, जिससे भविष्य में मेरे वंशजों से राज्य मांगने की संभावना ही नहीं रहेगी!'
सत्यवती के पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य शासन करने के योग्य नहीं बन पाए।
चित्रांगद अहंकार के कारण (युद्ध करने में सक्षम नहीं होते हुए भी) गंधर्वराज चित्रसेन से युद्ध करने गया जिसमें उसकी मृत्यु हो गई ।
विचित्रवीर्य व्यसनी और कामासक्त था। वह उपभोग का अतिरेक सहन नहीं कर सका और युवावस्था में ही उसकी मृत्यु हो गई।
विचित्रवीर की दो पत्नियों ने, अंबिका और अंबालिका ने महर्षि व्यास से नियोग व्यवस्था के अंतर्गत धृतराष्ट्र और पाण्डु को जन्म दिया।
(नियोग= वंश की वृद्धि के लिए पति/ श्वसुर कुल की सहमति / आज्ञा से सुयोग्य पुरुष के साथ रत होना। यह अधिकतम तीन समय किया जा सकता है। यह नियोग की धर्मसम्मत मर्यादा है)। इसके अन्य भी अनेक कडे नियम है।
अंबिकापुत्र धृतराष्ट्र अंध था । अतः पाण्डु को राज्य दिया गया क्योंकी राज्यरक्षण और प्रजापालन का भार अंध व्यक्ती की क्षमताओं के अनुकूल नहीं है।
पाण्डु ने वंशवृद्धी हेतु स्वयं को असमर्थ पाने पर पर, अस्थायी रूप से धृतराष्ट्र को राज्य सौंप दिया और स्वयं वन जाने का निश्चय कर लिया ।
उनकी दोनों पत्नीयों ने , अर्थात, कुन्ती और माद्री ने भी उनके साथ वनगमन किया।
वन में कुन्ती और माद्री ने नियोग पद्धति के अंतर्गत कुल पाँच बालकों को जन्म दिया।
पाण्डु की मृत्यु पश्चात माद्री सती हो गई और कुन्ती अपने पाँच अवयस्क बच्चों के साथ हस्तिनापुर लौट आई।
अब युधिष्ठिर को अपने पिता का राज्य मिल जाना चाहिए था । परंतु धृतराष्ट्र राज्य पर अपना अधिकार जमाए बैठे थे। वह अत्यधिक राजसुख भोग रहे थे, किंतु राज्य की रक्षा और व्यवस्था का सारा भार पितामह भीष्म पर ही था।
पाण्डव और कौरवों के युवा होने पर उनके विवाह हुए और यथासमय उनके बच्चों के भी विवाह होते रहे।
धीरे धीरे हस्तिनापुर की राजसभा पर अब दुर्योधन का पूर्ण नियंत्रण हो गया । भीष्म को कोई अधिकार नहीं था, दुर्योधन उनका आदर नहीं करता था, धृतराष्ट्र भी सम्मान देने का दिखावा करते थे, लेकिन उनके लिए भी भीष्म का ऐसा कोई मूल्य नहीं है।
फिर भी उनमें से किसी में भी भीष्म से पार पाने का साहस और क्षमता नहीं थी। धृतराष्ट्र और दुर्योधन दाँत पीसते रह गए परंतु भीष्म को राज्य से निष्कासित नहीं कर पाए ।
वृद्ध ही सही किंतु वह सिंह है! परशुराम के प्रिय शिष्य (गंगापुत्र) गांगेय देवव्रत भीष्म शस्त्र संचालन में कुशल थे। उन्होंने तपस्या से अनेक अस्त्र भी प्राप्त किये थे।
हस्तिनापुर साम्राज्य की सैन्य शक्ति से अन्य राज्य भयभीत थे इसका मुख्य कारण भी पितामह भीष्म ही थे!
समय के महान् प्रवाह के साक्षी हैं भीष्म!
उनकी आयु सौ वर्ष से भी अधिक थी और कुरुक्षेत्र पर युद्ध क समय भी वह शत्रुसेना सेना को भय से आक्रांत करनेवाली भयंकर लड़ाई कर सकते थे !
शंख बजाने के लिए कितनी शक्ति की आवश्यकता होती है! अब कौरवों के इस शक्तिशाली सेनापति ने युद्ध प्रारम्भ करने के संकेत के सिंह समान प्रचंड गर्जना कर उच्च स्वर में शंख ध्वनि की है और सभी को से युद्ध के लिए सावधान होने का संकेत दिया है ।
और दुर्योधन भी उनके प्रचंड शंखनाद से आल्हादित हुआ है।
सेनापती के शंख का घोष सुनते ही अन्य योद्धाओं ने भी शंख बजाना प्रारंभ किया । साथ ही भेरी जैसे अन्य रणवाद्य भी बजाए जाने लगे और सभी वाद्यों के एकत्रित नाद से प्रचंड ध्वनि निर्माण हुआ ।
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क्रमश:
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