हिंदु धर्मसंस्कार🚩 : भाग २१०

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १

ततः श्वेतर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंङ्खौ प्रदध्मतुः॥१४॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
 
इकडे शुभ्र घोड्यच्या मोठ्या भव्य रथांतुनि ॥
माधवे अर्जुने दिव्य फुंकिले शंख आपुले ॥ १४ ॥
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कुरुक्षेत्र में विविध योद्धाओं द्वारा जो शंखघोष किया गया उसका वर्णन आगे के कुछ श्लोकों में है।
जिस प्रकार लोगों के अलग-अलग नाम होते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक योद्धा के शंख का भी अलग-अलग नाम होता है। इसका वर्णन आगे आता है।
परंतु इन श्लोकों में  योद्धाओं और उनके शंख के नामों की केवल सूची नहीं हैं । 

जैसे  नदी की स्वच्छ बहती धारा के नीचे से तलहटी के रंग-बिरंगे शंख, पत्थर , छोटे-छोटे जलीय पौधे दिखाई देते है अथवा मेघों के आवरण के पीछे छिपे सूर्य की प्रभा का सौंदर्य जैसे मेघों के प्रकाशमान किनारों से दृग्गोचर होता है वैसे ही शंखघोष के वर्णन में युद्धसज्जित उस योद्धा का वर्णन भी अत्यंत मनोरम प्रकार से इन श्लोकोंसे उभरकर आता है ।
    
इसिलिए महाभारत को महाकाव्य कहा जाता है! 
भारत में केवल दो पुस्तकों को , रामायण और महाभारत को - इतिहास कहा गया है क्योंकि यह भारत का और हिंदुओं का इतिहास है। 
हमारा गौरवशाली इतिहास! 
परन्तु हमारा यह इतिहास पाश्चात्यों की शैली में नहीं लिखा गया है। गद्य रूप में लेखन करना प्राचीन भारत में इतिहास अथवा शास्त्र लिखने की पद्धती नहीं थी। यहाँ इतिहास, गणित, खगोल विज्ञान, भौतिक विज्ञान, भौतिकी, भूगोल, आरोग्यशास्त्र -चिकित्सा जैसे विषयों को भी कविता के रूप में ही लिखा गया था। 

भारतीय संस्कृती कितनी सुंदर  है! 
क्योंकि इसका अर्थ है कि भारत में इन सभी विषयों के विशेषज्ञ भाषाविद् और कवि भी थे। 
परंतु नॉस्ट्रेडेमस के सांकेतिक भाषा में किए गए लेखन का अर्थ ढूंढकर उसे महान आश्चर्यकारक भविष्यवाणी कहनेवाले पाश्चात्य विद्वान काव्यरूप मे लिखे गए हमारे रामायण और महाभारत को इतिहास की मान्यता नहीं देते है। वह उन्हें 'पुराण' अर्थात काल्पनिक कथा कहते है । 

पुनः कुरूक्षेत्र पर आते है! 
अर्जुन के सारथी है योगेश्वर कृष्ण !
हमने कहानियाँ सुनी है कि गोकुल में पल रहे कृष्ण जब बांसुरी बजाते थे तब न केवल उनकी गायें बल्कि जंगल के सभी जानवर और पक्षी मंत्रमुग्ध हो जाते थे और पास आकर खडे होते थे। और यह प्राणी इतने मुग्ध हो जाते थे कि शेर के साथ ही हिरण खडा हुआ करता था। 
प्राणियों से प्रेम करने वाले कृष्ण! 
उन्हें अपने रथ के घोड़ों से कितना प्रेम होगा ! 
सारथी सिर्फ रथ चलाता नहीं है, उसके मन को रथ चलाने वाले घोड़ों के साथ एकाकार होना पड़ता है। 

इसिलिए महाभारत युद्ध  में अनेकों बार यह वर्णन आता है कि श्रीकृष्ण (स्वयं ) थके हुए घोड़ों को पानी पिलाने या उन्हें थोड़ा विश्राम देने के लिए ले गए थे , अतः उतने समय अर्जुन युद्ध के मैदान में पृथ्वी पर खड़े होकर युद्ध कर रहे थे। 
कृष्ण ने सारथी बनने को कनिष्ठ अथवा लांछनास्पन्द काम नहीं माना था। वह उसे 'छोटा काम ' मानकर लज्जित नहीं थे। उन्होने सारथि के इस कार्य को स्वयं चुना था। 

कितना सुंदर रूपक ( metaphor) है !
मनुष्य के जीवन की डोर थामकर  उसे सुयोग्य पथ पर ले जानेवाले योगेश्वर ने अर्जुन के रथ की डोर संभाली है ! 
कुरुक्षेत्र के युद्ध का निर्णय क्या उसी क्षण नहीं हो गया था !
बाकी १८ दिन का युद्ध तो मात्र एक उपचार था ।

तो श्रीकृष्ण ! 
वह स्वयं घोड़ों की देखभाल करते थे ..
उनके चारा पानी की व्यवस्था करते थे .. 
बाते करते थे घोडोंसे और उन्हे प्रेम से सहलाते थे ..  
गूंगे जानवर प्रेम को अनुभव कर सकते  हैं! 
और यहाँ तो साक्षात  हरी  स्वयं उनकी पीठ सहला रहे हैं, तो स्वाभाविक था कि उन घोडों ने प्रेमपूर्वक आत्मसमर्पण कर दिया हो! 

कौरव सेनापति भीष्म की शंखध्वनि सुनकर श्रीकृष्ण पहला प्रतिघोष वही करते हैं। यहाँ अर्जुन के रथ का बहुत सुन्दर वर्णन है। 
यह सफेद घोड़ों वाला एक बड़ा रथ है। और (अर्थात युद्ध के लिए वह शस्त्रों से, अन्न - जल, औषधियों से सज्ज हैं) । इस भव्य रथ पर सवार होकर, कृष्ण और उनके साथ अर्जुन अपने दिव्य शंखों का घोष कर रहे हैं।
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क्रमश:
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