हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१२

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ।।१६।।
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गीताई : (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
तेव्हा अनन्तविजये धर्मराज युधिष्ठिरे।
नकुळे सहदेवे ही सुघोष मणिपुष्पक॥१४॥
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अध्याय १ : श्लोक १६ : भाग १

इस श्लोक में वर्णन है कि युधिष्ठिर और नकुल - सहदेव द्वारा अपने अपने शंख का घोष किर जाने का वर्णन है।  
धर्मराज युधिष्ठिर अपने अनंतविजय नामक शंख का घोष कर रहे है। नकुल अपने सुघोष नाम के शंख का और सहदेव अपने मणिपुष्पक नाम के शंख का घोष कर रहे है।

युधिष्ठिर धर्मराज भी कहलाते है। क्योंकि सूक्ष्म स्तर पर भी धर्म की समिक्षा कर उसे समझने की क्षमता उनमें थी। 
वह भेदभाव से परे थे और सदैव धर्म के मार्ग पर चलते थे। 
उनमें अद्भुत संयम और इन्द्रियनिग्रह था।
वह अत्यंत विनम्र और निर्लोभी थे और राजा के लिए यह गुण विशेष है क्योंकि इस पद पर आसीन व्यक्ति इन गुणों के आधार पर ही न्यायसंगत कार्य कर सकता है।

उनके गुणों को उनके जीवन के कुछ प्रसंगों से समझा जा सकता है :
🔹 अर्जुन ने द्रौपदी स्वयंवर में विजय प्राप्त किया और वह द्रौपदी को घर लाए। 
परंतु उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि  प्रतिवेदन (= ज्येष्ठ भ्राता के अविवाहित रहते कनिष्ठ भ्राता का विवाह) अधर्म है । इसलिए द्रौपदी से युधिष्ठिर को विवाह करना चाहिए।
द्रौपदी जैसी परमसुंदरी - विदुषी स्त्री के मोह से युधिष्ठिर विचलित नहीं हुए, उन्होने प्रथम ज्येष्ठ भ्राता के विवाह करने के अधिकार का प्रयोग कर द्रौपदी को अपनी पत्नी नहीं बनाया। भविष्य के लिए सोचकर उन्होने कृष्ण की बात मान ली और द्रौपदी का विवाह पाँचो पाण्डवों से करने का निर्णय लिया।

🔹 वनवास काल में उनके भ्राता जल लाने के लिए एक एक कर सरोवर जाते रहे परंतु लौटे नहीं !
उन्हे ढूंढने निकले युधिष्ठिर ने पाया की सरोवर के रक्षक यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देने की बाध्यता उनके भ्राताओं ने नहीं मानी थी इसलिए उन सबकी मृत्यु  हुई है (or induced coma as per modern science ? )
परंतु यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए युधिष्ठिर प्रस्तुत हुए और उनके उत्तरों से यक्ष प्रसन्न हुए । उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि वह किसी भी एक भ्राता को पुनः सचेत कर लौटाएंगे ।

युधिष्ठिर ने सहदेव को मांगा । 
यक्ष चकित हुए ! 
सगे भ्राता को छोडकर सहदेव को क्यों मांगा ?
धर्मराज कहते है कि जिस प्रकार माता कुंती का एक पुत्र अर्थात वह स्वतः जिवित है उसी प्रकार माता माद्री का भी एक पुत्र जिवित हो यहीं न्यायसंगत है !

कितना न्यायपूर्ण और स्वार्थरहित व्यवहार हैं उनका !

🔹कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में भी वह युद्ध को प्रारंभ करने से पूर्व रथ से उतरे हैं और कौरवों की सेना में जाकर उन्होने पितामह भीष्म और गुरु द्रोण से युद्ध में विजय का आशीर्वाद मांगा है !
इतनी नम्रता और न्यायबुद्धी के कारण ही वह धर्मराज कहलाए है !
(उनका द्यूत खेलना, भ्राताओं और पत्नी को दांव पर लगाना आदि कुछ प्रसंगों के कारण उनकी निंदा भी की जाती है, किंतु उसके लिए युधिष्ठिर के व्यवहार के कारण समझने की आवश्यकता है जो इस format में कदाचित संभव ना हो !)

अब इस श्लोक में किया गया  वर्णन किस विशेषता की ओर संकेत कर रहा है?
युद्धक्षेत्र पर योध्दा शस्त्रसज्ज खडे है और अपने अपने शंख का घोष कर रहे है ।
किंतु शंख तो योध्दा का होता है !

सामान्यतः हम भीम को बलवान्  और अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धर के रूप में देखते है । परंतु युधिष्ठिर - नकुल और सहदेव का वर्णन अथवा उनके विषय में कल्पना  पराक्रमी योद्धा के रूप में कदाचित ही की जाती हो।

किंतु युधिष्ठिर भी योद्धा है जो राजा बनने के लिए अत्यावश्यक है। 
भीम का शस्त्र है गदा और अर्जुन का धनुष्य-बाण। 
इसी प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर का भी अपना विशेष शस्त्र है भाला !
हाँ ! युधिष्ठिर भाला चलाने में निष्णात है !

ज्येष्ठ भ्राता के रूप में अथवा इन्द्रप्रस्थ के राजा होते हुए उनके भ्राताओं ने युद्ध का भार सदैव स्वयं लिया है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि युधिष्ठिर में पराक्रम का अभाव था ! 
इसलिए कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में वह स्वयं भी योद्धा बनकर आएं है और अनंतविजय नाम के अपने शंख का घोष कर रहे है !

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अध्याय १ : श्लोक १६ : भाग २ क्रमश :
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