हिंदु धर्मसंस्कार🚩 : भाग २१४

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ।। १९ll
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
त्या घोषे कौरवांची तो हृदयेचि विदारिली।
भरूनि भूमि आकाश गाजला तो भयंकर ॥१९॥
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पाण्डवपक्ष के विभिन्न योद्धाओ द्वारा किए गए शंखघोष का वर्णन पिछले कुछ श्लोकों में किया गया है।
इन शंखों के घोष का स्वर इतना उच्च था कि उससे केवल धरती ही नहीं , आकाश भी व्याप्त हो गया और कौरव भयभीत हो गए।

इस श्लोक में किए गए वर्णन से आश्चर्य हो सकता है क्योंकी कौरवों की सैन्यसंख्या तो पाण्डवों से कहीं अधिक थी ..
वहाँ भी तो योद्धा थे ..
वह भी शंखघोष कर रहे थे ..
फिर पाण्डवपक्ष के योद्धाओं के शंखघोष से कौरवों का हृदय भयभीत क्यों हुआ ?

कदाचित इसलिए कि अधर्मी जो अन्याय करतें है उसके मूल में उनका अज्ञान नहीं , उनकी वैसी वृत्ति और स्वभाव होता है । वह जानतें हैं कि वह अन्याय और अधर्म कर रहे है। वह सज्जनों की सभ्यता को दुर्बलता समझते है और स्वयं ढिठाई का मार्ग अपनातें है। आगे अन्याय का रूप धारण करता है।
सज्जनों अपने संयम के कारण विरोध नहीं करते है। इसलिए दुर्जनों का साहस बढ़ता है और वह दुर्वतन की सीमा लांघ जाते है, वैसेही, जैसे शिशुपाल श्रीकृष्ण के अपराध करता रहा था। 
शिशुपाल की माँ अर्थात अपनी बुआ का दिए गए वचन के अनुसार उसके १०० अपराधों को श्रीकृष्ण ने  क्षमा की थी। किंतु १०० अपराधों का घड़ा भरते ही सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का मस्तक धड से विलग हो गया।

कुछ इसी प्रकार पाण्डव सेना संख्याबल में कम थी, किंतु मनोबल में पूर्णतः दृढ होकर युद्धसज्ज खडी थी। इस पक्ष के योध्दा आनंदित थे कि अब उन्हे अत्याचारियों के वध का सुअवसर मिलेगा। इसके पूर्व वर्षों तक हस्तिनापुर की प्रजा ने अत्याचार सहन किए थे और अनेक अन्य राज्यों को भी दुर्योधन ने आतंकित कर रखा था।

सज्जनों को कुछ समय तक दबाकर रखा जा सकता है, किंतु अंततः जब वह शस्त्र उठा ही लेते है, तब दुर्जन कैसे भयभीत हो जाते है इसी का उदाहरण इस श्लोक में देखा जा सकता है !
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क्रमश :
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