हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१६

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥
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गीताई : ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
         
संजय म्हणाला
अर्जुनाचे असे वाक्य कृष्णे ऐकूनी शीघ्र चि ।
दोन्ही सैन्यांमधे केला उभा उत्तम तो रथ ॥२४॥
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अर्जुन की सूचनानुसार श्रीकृष्ण ने रथ को दोनो सैन्यों के बीचोबीच  लाकर खडा किया है।
अर्जुन यहाँ से दोनो पक्षों को समान अंतर से देख सकते है।
इस श्लोक मे वर्णन केवल इतना ही हैं। किंतु इस समय हम कृष्ण द्वारा अर्जुन का सारथि बनना और उसका कुरुक्षेत्र के युद्ध पर हुआ परिणाम इसपर  विचार कर सकते हैं। 

व्यापक पटल (large canvas) पर देखा जाए तो श्रीकृष्ण केवल कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन के सारथि नहीं थे, वह तो पाण्डवों के जीवनरथ के सारथि थे।
महाभारत में श्रीकृष्ण का प्रवेश द्रौपदी विवाह के समय होता है। वह एक विचित्र स्थिति बन गई थी जिसमें अनेक मुद्दों पर विचार कर निर्णय लेना था।

स्वयंवर में विजय अर्जुन का हुआ था किंतु दोनो ज्येष्ठ भ्राता अर्थात युधिष्ठिर व भीम के विवाह से पूर्व अर्जुन का विवाह करना धर्मसम्मत नहीं था।
स्वयंवर का पण अर्जुन ने पूर्ण किया था किंतु अनेक क्षत्रियों के वहाँ रहते एक ब्राह्मण द्वारा स्वयंवर में विजयी होने को अनेक क्षत्रिय सहन नहीं कर पाएं और वहाँ युद्ध जैसी स्थिति बन गई। युधिष्ठिर व नकुल - सहदेव के साथ द्रौपदी को घर भेजकर भीम और अर्जुन संग्राम के लिए सिद्ध हुए और दोनो ने मिलकर सबको पराजित किया।
ऐसे में स्वयंवर में भीम की भूमिका भी लक्षणीय रही यद्यपि प्रत्यक्ष पण अर्जुन ने जीता था।
युधिष्ठिर चिंतित थे क्योंकि द्रौपदी जैसी अनुपम सुंदरी और बुद्धिमति पत्नी किसी पाण्डवों में से एक को प्राप्त होने पर भविष्य में पाँचो भाईयो में एकजूट ना रहने की संभावना थी।

अब पाण्डवों के जीवन में  श्रीकृष्ण का मार्गदर्शक के रूप में प्रवेश होता है !
नातेसंबंध तो उनका था ही । श्रीकृष्ण पाण्डवों के ममेरे भाई थे। पाण्डवों की माता पृथा श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की भगिनी थी। उन्हे राजा कुन्तिभोज ने दत्तक लिया था इसलिए वह कुन्ती कहलाई !

यहाँ श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को परामर्श दिया कि द्रौपदी का पाँचो भ्राताओं की पत्नी बनना योग्य होगा।
क्यों मानी पाण्डवों ने उनकी बात ? 
इससे पूर्व तो कृष्ण से उन के संबंध का वर्णन महाभारत में मिलता ही नहीं हैं, तब उनपर इतना विश्वास क्यों और कैसे कर लिया ?
महाभारत लेखन में यह वर्णन ना भी हो, किंतु पाण्डव श्रीकृष्ण की ख्याति से अपरिचित तो नहीं होंगे ! और अब - जब हम धार्मिक हिंदुओं की दृष्टी से गीता का अभ्यास कर रहें हैं तब यह भी तो मानेंगे की प्रभु ने अपने मोहक स्मित - मनमोहन रूप और मधुर वाणी और अपने स्वार्थरहित आश्वासक व्यक्तित्व से पाण्डवों के मन को ऐसा आकृष्ट कर लिया की वह गोकुल की गायों के समान प्रभु के शब्दों के अनुसार आचरण करने लगे ! 

हम कभी नहीं जान पाएंगे की श्रीकृष्ण के साथ पाण्डवों के  उस साक्षात्कार में क्या क्या घटित हुआ था किंतु सत्य यहीं है कि पाण्डवों के अंतिम हित का वह निर्णय श्रीकृष्ण के कहने के पश्चात ही हुआ था।

जरासंध के वध के लिए भी भीम - अर्जुन के साथ श्रीकृष्ण ही मगध देश की राजधानी राजगृह (आधुनिक बिहार का राजगीर) गए थे और उनके मार्गदर्शन में ही भीम ने जरासंध का वध किया था।

इन्द्रप्रस्थ के निकट का खाण्डववन पूर्णतः शत्रुशक्तियों का गढ़ बन गया था। तब देव अग्नि की सहायता लेकर उसे पूर्णतः अग्निसात करने का कार्य अर्जुन ने श्रीकृष्ण की सूचना और मार्गदर्शन अनुसार ही किया और इन्द्रप्रस्थ को उस ओर से भयमुक्त किया ।

सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से होना रोककर श्रीकृष्ण ने अपनी प्रिय बहन को अपने प्रिय अर्जुन को सौंपने की स्थिति बनाई थी। उन्होंने आगे भी अभिमन्यू को पूर्ण युद्धशिक्षा दी जब पाण्डव वनवास और अज्ञातवास कर रहे थे।

इन्द्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के पश्चात श्रीकृष्ण ने ही उन्हे 'राजसूय यज्ञ' करने का सुझाव दिया था।
राजसूय यज्ञ केवल उस राजा को चक्रवर्ती सम्राट का गौरव दिलाने के लिए नहीं होता है। वस्तुतः थोडे थोडे अंतर पर पृथक राज्य होंगे तब आपस में उनके सैन्यों की भिडंत (संघर्ष ) होना निश्चित होता है। इससे जीव और वित्तहानी होती है और प्रजा को सुरक्षित जीवन भी नहीं मिल पाता।
अतः समाजकल्याण के लिए राजसूय यज्ञ कर आर्यावर्त के विभिन्न राजाओं को अपने छत्र में लेकर चक्रवर्ती सम्राट बनने का सुझाव श्रीकृष्ण ने ही युधिष्ठिर को दिया था।

आगे कुरुक्षेत्र के युद्ध से पूर्व शांति और संधि का प्रस्ताव लेकर पाण्डवों के दूत बनकर श्रीकृष्ण ही हस्तिनापुर गए थे। यह बात और है कि दुर्योधन ने ना केवल संधिप्रस्ताव ठुकराया, बाल्कि श्रीकृष्ण को कैदी बनाने का प्रयत्न भी किया था जिसमे वह सफल नहीं ही हो पाया।

इन सारे प्रसंगों में से स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण का पाण्डवों के जीवन में कितना महत्व था।
अब कुरुक्षेत्र पर युद्ध होने जा रहा है।
और कृष्ण को सारथि पाकर अर्जुन धन्य है !

वस्तुतः गीता के अभ्यास का उद्देश भी यहीं है कि अपने जीवन का सारथ्य प्रभु को सौंपकर हम मात्र उनके आज्ञाकारी भक्त बनें !
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क्रमश :
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