हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१५

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ॐ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।२०।।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेsच्युत् ।।२१।।
यावदेतान्निरीक्षेsहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे॥२२।।
योत्स्यमानानवेक्षेsहं य एतेsत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ।।२३।।
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
मग नीट उभे सारे पुन्हा कौरव राहिले।
चालणार पुढें शस्त्रे इतुक्यात कपि-ध्वज ॥२०॥
हाती धनुष्य घेऊनी बोले कृष्णास वाक्य हे।

 अर्जुन उवाच
दोन्ही सैन्यांमधे कृष्णा माझा रथ उभा करी॥२१॥
म्हणजे कोण पाहीन राखिती युद्ध-कामना।
आज या रण संग्रामी कोणाशी झुंजणे मज॥ २२॥
झुंजते वीर ते सारे घेत पाहूनि येथ मी।
युध्दी त्या हतबुद्धीचे जे करुं पाहती प्रिय ॥२३॥
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आज के भाग में हम श्लोक २० से २३ पर एकत्र विचार करेंगे क्योंकि अर्थ समझने की दृष्टी से इनपर एकत्रित विचार करना उपयुक्त होगा।
पिछले श्लोक में पाण्डवपक्ष के वीरों द्वारा किए गए शंखघोष से कौरव सैन्य जिस प्रकार भयभीत हुआ उसका वर्णन था।
अब कौरवपक्ष ने युद्ध के लिए पुनः साहस बांध लिया है और वह अपने अपने स्थान पर खडे हो गए है।
युद्ध की अंतिम घोषणा कर शस्त्रों से आघात बस प्रारंभ ही होना था तभी अर्जुन ने सबको रोका और श्रीकृष्ण से कहा कि दोनो सैन्यों के बीचोबीच हमारा रथ खडा किजिए।

अर्जुन कहते है, "मैं देखना चाहता हूँ कि किस किस के मन में युद्ध करने की इच्छा है और इस युद्धभूमि में मुझे किनसे युद्ध करना है। मैं देखना चाहता हूँ कि दुर्बुद्धिवाले उस (दुर्योधन) का हित करना कौन चाहता है।"
अर्जुन के इन शब्दों से हम समझ सकते है कि दुर्योधन का साथ देनेवाले जो लोग है  जिनके कारण पाण्डवों का अधिकार छीना जा रहा है उनपर अर्जुन संतप्त है। क्रोधित हो कर वह कह रहे हैं कि दुर्योधन जैसे दुष्टबुद्धी व्यक्ति का साथ देनेवाले और उसका हित चाहनेवाले लोग यदि होंगे तो अब इस युद्धभूमि में मैं उनसे युद्ध करूंगा !

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क्रमश :
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