हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २११

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ ॐ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
 
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ।।१५।।
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गीताई : ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
पांचजन्य हृषीकेशे देवदत्त धनंजये।
पौण्ड्र तो फुंकिला भीमे महाशंख महाबळे॥१५॥
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अध्याय १ : श्लोक १५ : भाग १

हृषीकेश (श्रीकृष्ण)अपने पांचजन्य नामक दिव्य शंख का , धनंजय (अर्जुन) अपने देवदत्त नामक शंख का और भीम अपने पौण्ड्र नामक शंख का  घोष कर रहे है।

हृषीकेश का अर्थ है मन को नियंत्रण रखने की क्षमता होने के कारण इंद्रियों को भी अपने वर्चस्व में रखनेवाले...

कितना सार्थक नाम है। 
श्रीकृष्ण को 'भोगों का स्वामी' कहा जाता है। वह मानवरूप में इस संसार में थे इसलिए  उनका व्यवहार भी मानव के समान ही था। उन्होने गोपालों के मध्य बचपन व्यतीत किया है ।
उसके पश्चात मथुरा और फिर द्वारका में वह प्रासाद में रहते है , रेशम के वस्त्र , अलंकार पहनते है.. 
वह गृहस्थाश्रमी (विवाहित) है , उनकी आठ पत्नीयाँ है ( १६१०८ नहीं ! केवल ८ !  )। उनके पुत्र - पुत्रीयाँ भी है .. संक्षेप में वह सभी सुखों का आनंद लेते है।

फिर भी श्रीकृष्ण उन सुखों के प्रति आसक्त नहीं है ... 
वह सुख को सहज भाव से स्वीकार भी करते है और त्याग भी सकते है ...
वस्तुतः उनके मन में सुख और दुःख यह भाव एकाकार ही है। उनके लिए सुख यह सुख है भी और नहीं भी क्योंकि यह भावनाएँ तो उस व्यक्ति के मन को आंदोलित करती है जो स्वयं के लिए सुखों की व्याख्या करता है और उन सुखो को प्राप्त ना करने को दुख मानता है।

सुख और दुख ऐसी व्याख्याओं से परे है श्रीकृष्ण...
उनके मन में तो शत्रुता, द्वेष इन भावनाओं का भी स्थान नहीं है।
वह किसी से घृणा करते ही नहीं है।

इसे कैसे सत्य माने ?
उन्होंने कंस और शिशुपाल का वध किया है ..
वह कालयवन के वध के लिए उसे महर्षी मुचकुंद के विश्रामस्थल में ले गए थे ...
जरासंध के वध में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी..
उन्होने कुरुक्षेत्र में खिन्न बैठे अर्जुन को युद्ध अर्थात मनुष्यसंहार के लिए प्रेरणा दी थी ..

अब भी हम ये कहें की श्रीकृष्ण प्रेम का साकार रूप हैं?
हाँ , यहीं सत्य है !
क्योंकि यह सब उन्होने अपनी वैयक्तिक शत्रुभावना के कारण अथवा विजयी होने का गौरव प्राप्त करने के लिए नहीं किया था, यह तो उन्होने प्रजा को अन्यायियों के अत्याचार से मुक्ति देने के लिए किया था । 
अधर्मी व्यक्ति को सन्मार्ग पर आने का अवसर देने पर भी जब वह अधर्म ही करता रहे तब उसे दण्ड देना भी धर्मकार्य होता है !
उनका विरोध अधर्मी कृत्य से था, अधर्मी व्यक्ती से नहीं !
इसके उदाहरण उनके चरित्र में है !

कंस वध के पश्चात उसकी पत्नियों को (अस्ति व प्राप्ति) अपने पिता जरासंध के पास जाने से उन्होने नहीं रोका ...
कंस के मंत्री - अधिकारियों को उन्होने मृत्युदंड नहीं दिया ..
जरासंध के वध के पश्चात उन्होने पाण्डवों को परामर्श दिया कि मगध का राज्य उसके पुत्र सहदेव को ही सौंपा जाए ..
शिशुपाल का वध भी उन्होंने १०० अपराध पूर्ण होने पर ही किया है , उसके पहले तो वह क्षमा ही करते रहे है ..
रुक्मिणी द्वारा प्रेमनिवेदन के पश्चात उन्होंने रुक्मिणी का हरण किया था । तब भी उन्होंने उसके भ्राता रुक्मि को युद्ध में पराजित किया और छोड दिया, उसका वध नहीं किया..
उन्होंने शत्रुओं के मृत्युपश्चात  उनके दाह संस्कार का प्रबंध भी किया..
कौरवपक्ष के सेनापती थे भीष्म ! यद्यपि उनके वध को कृष्ण ने रोका नही था, किंतु शरशैय्या पर पडे हुए भीष्म से राजधर्म का उपदेश लेने के लिए उन्होने ही युधिष्ठिर को पितामह के पास भेजा था !

कृष्ण अधर्मी वृत्ती का नाश और धर्मस्थापना चाहते हैं , उनका मन सुख - दुख - शत्रुता - बैर ऐसी नकारात्मक भावनाओं से परे है, इसलिए उनका व्यवहार इंद्रियों की सुखलोलुप वृत्ती का दास नहीं हैं !
इसिलिए वह हृषिकेश कहलाते हैं !

वह प्रत्येक घटना को अविरत चले आ रहे जीवन के प्रवाह का अनिवार्य भाग जानकर स्वीकार करते है ...

जैसे कमलपत्र पूर्ण समय पानी में ही जीवन व्यतीत करता है, छोटे से बडा होता है , कमलफूल का आधार बनता है , जलचरों के साथ रहता है और शीतल जल का सुख भी अनुभव करता है है , किंतु फिर भी कमलपत्र पर किसी का भी अस्तित्व हावी नहीं होता , पानी का भी नही , उसपर पानी की बूंद तक नहीं रुक सकती , वैसेही , श्रीकृष्ण सबके साथ रहते है,  वह दुष्टों को दण्ड देते है और सज्जनों की रक्षा करते है , उनका मार्गदर्शन करते है ,  किंतु वह इच्छा - वासना - आशा आकांक्षाओं से लिप्त इस मानवी जीवन में कमलपत्र के समान ही वास करते है !
उनके मन में केवल प्रेम ही है !
ऐसे श्रीकृष्ण अपने पांचजन्य नामक दिव्य शंख का घोष कर रहें है !
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आज इस श्लोक पर विचार पूर्ण नहीं हो पाया है !
यह ऐसी स्थिति है जब बालक माता की अंकपर जा बैठता है । माता उसे प्रेम से सहलाती - पुचकारती है , गले लगाती है , मधुर शब्द कहती है , उसका चुंबन भी लेती है परंतु बालक है कि उसे माता को छोडना ही नहीं है, उसे खिलौने , संगीसाथी, पकवान .. कुछ भी नहीं चाहिए !  माता की गोद में बैठने से उसका मन ही नहीं भरता है !

गीता का प्रत्येक शब्द ऐसा ही है जो माता समान बालक को आकर्षित करता है ।

और हृषिकेश शब्द पर विचार - मनन करने पर ही हम गीता के उपदेश पर आचरण कर पाएंगे क्योंकि इससे हम यह समझ पाते हैं कि श्रीकृष्ण ने केवल मौखिक उपदेश नहीं किया है , उनका आचरण और उनके उपदेश में एकत्व है !

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अध्याय १ : श्लोक १५ : भाग २ : क्रमश:
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