हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१७

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नम: 
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श्रीमद् भगवद्गीता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मौल्यवान उपदेश किया है।
अर्जुन ही क्यों ?
ऐसा क्या था अर्जुन में ?
वह उच्च कोटी के धनुर्धर अवश्य थे , परंतु उनके चरित्र में ऐसा क्या था की प्रभु ने ज्ञान का ऐसा कोष उनपर लुटा दिया ?
द्रौपदी जैसी पत्नी होनेपर भी उलुपी, चित्रांगदा और सुभद्रा भी तो थी उनके जीवन में ! स्त्री का इतना मोह रखनेवाला व्यक्ति क्या स्खलित नहीं था ?

यह कुछ ऐस प्रश्न है जो पाण्डवो संबंधी चर्चा में उठाए जातें है। 
साथ ही निहत्थे कर्ण पर बाण चलाने को अपराध बताकर अर्जुन को खलनायक बताने का उपक्रम जब किया जाता है तब अर्जुन के एक से अधिक पत्नियों के अस्तित्व को उनके व्यक्तित्व में संयम की कमी बता कर उनके चरित्र पर धब्बे लगाने का प्रयास किया जाता है।

तो क्या यह श्रीकृष्ण की बुध्दी पर ही उठाया गया प्रश्न नहीं है ?
ऐसे व्यक्ति को गीतोपदेश के लिए पात्र मानने के लिए क्या प्रभु पर उँगली उठाई जाएगी ?

वस्तुत: किसी भी व्यक्ति के चरित्र को, उसके निर्णय व  आचरण को उनकी पार्श्वभूमि के साथ और उस काल के सामाजिक संदर्भ में देखना उचित होगा।

द्रौपदी पाँचो भ्राताओं की पत्नी थी। इसलिए उन्हे किस पाण्डव के साथ कब पत्नीधर्म से रहना है यह निश्चित करने के लिए देवर्षी नारद के मार्गदर्शन में नियम बनाए गए थे जिसके अनुसार प्रत्येक पाण्डव के साथ वह एक एक वर्ष पत्नीधर्म से रहती थी।

यह क्यों आवश्यक था ?
🔹 पाण्डवों को आपसी आपाधापी (confusion) से बचने के लिए अत्यावश्यक
🔹 पाण्डवों में द्रौपदी को लेकर कलह ना हो इसलिए आवश्यक 
🔹 द्रौपदी के लिए सास तो पूर्णसमय कुंती ही थी किंतु सभी पाण्डवों के साथ उस उस समय उनका व्यवहार कैसा हो यह उन्हे समझने के लिए आवश्यक 
🔹 द्रौपदी की मर्यादारक्षा के लिए अत्यावश्यक ! अन्यथा एक ही समय पाँच समर्थ - पूर्ण पुरुष पतियों की पत्नी बने रहना क्या उनके लिए शारिरीक और मानसिक स्तर पर अन्याय ना होता ?

इसलिए माता कुंती ने अपने पुत्रों के अन्य विवाह भी करवाएं है और द्रौपदी के उन सभी पत्नीयों के साथ संबंधों को देखकर इन विवाहों के लिए उनकी अनुमति का सहज आकलन होता है।

किंतु इन्द्रप्रस्थ में रहते समय अन्य भ्राताओं के समान अर्जुन ने अन्य कोई विवाह नहीं किया है।

परंतु एक समय इंद्रप्रस्थ के किसी ब्राह्मण की गायों को दस्यु (dacoits)  हांककर ले गए। ब्राह्मण ने अर्जुन से सहायता की याचना की। अर्जुन अपने शस्त्र लेने के लिए शस्त्रागार में गए । तब वहाँ सम्राट युधिष्ठिर व साम्राज्ञी  द्रौपदी शस्त्रभांडार का निरीक्षण कर रह थे।
अर्जुन उनकी सम्मति से शस्त्र लेकर दस्युओं के पारिपत्य के लिए गए। 
ब्राह्मण की गायों को लौटाने के पश्चात वह सम्राट को उसका इतिवृत्त बताने गए तब उन्होने द्रौपदी के संदर्भ में बनाए गए नियमों के अनुसार बारह वर्ष तक वनवास के लिए जाने का निश्चय उन्हे बताया ।

सभी पाण्डव और द्रौपदी आश्चर्यचकित हुए और उन्होने इस का विरोध भी किया। 
युधिष्ठिर और द्रौपदी ने कहा भी की अर्जुन जब उनके रहते शस्त्रागार में आएं तो वह सम्राट और साम्राज्ञी होने के नाते राजधर्म के अनुसार शस्त्रों का निरीक्षण कर रहे थे। अतः यद्यपि वहाँ पर एकांत था किंतु वहाँ दोनो में सें किसी में भी श्रृंगार का भाव नहीं था । इसलिए नियम के अनुसार 'एकांतभंग' नहीं हुआ है। और अर्जुन को तो ब्राह्मण की सहायता के लिए शस्त्र अत्यावश्यक थे। शस्त्र ना लेते तो प्रजा की रक्षा ना कर पाने से राजधर्म का उल्लंघन हो जाता था। अतः अर्जुन नियम तोडने के अपराधी नही है।

अर्जुन इससे सहमत नहीं हुए। उन्होने कहा कि ऐसे तर्क के कारण वनवास ना जाने का निर्णय धर्म का उल्लंघन होगा और यद्यपि वह सबकी सद्भावना समझते है और नियमभंग को परिस्थितीजन्य विवशता भी मानते है, किंतु धर्मपालन के लिए नियमपालन अत्यावश्यक है इसलिए वह वनवास करेंगे ही !

अर्जुन के व्यक्तित्व की सुंदरता देखिए कि वह कष्ट से मिला राजवैभव और द्रौपदी जैसी पत्नी के दुर्लभ सहवास का मोह छोडकर वनवास के लिए गए।

वनवासकाल में जब वह हरद्वार / हरिद्वार गए तब वहाँ नागराज कौरव्य की पुत्री उलुपी ने उन्हे अचेत (unconscious) करने के लिए सौम्य विष का प्रयोग किया और वह उन्हे अपने प्रसाद में ले गई।
नागराज कौरव्य का राज्य निकट ही था। उलुपी उनकी इकलौती संतान और राजकन्या थी। 'नाग' यह एक प्रजाति थी। इसमें कन्याओं को अपने लिए पुरुष का वरण करने की स्वतंत्रता थी और उसके लिए पहले विवाह कर लेने का ऐसा कोई आग्रह भी नहीं था।
उलुपी अर्जुन पर मोहित होकर ही उन्हे अपने प्रासाद में लायी थी। उलुपी ने अर्जुन से  प्रणयनिवेदन किया और रतिदान की याचना की। अर्जुन ने नकार देते समय उन्हे अपने वनवास और ब्रह्मचर्य के विषय में बताया। 
उलुपी अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में मुखर (outspoken) थी। उन्होने प्रतिवाद किया। उनका कहना था की कामातुर कुँवारी कन्या की ऐसी याचना की अवहेलना करना समर्थ पुरुष के लिए धर्म के अनुकूल कैसे हो सकता है ?

अर्जुन फिर भी नहीं माने। उन्होंने धर्मपालन के लिए ब्रह्मचर्यपूर्वक वनवास करने के नियम पर चर्चा करते हुए कहा कि वह उसका उल्लंघन नहीं कर सकते !

उलुपी प्रतिवाद करती रहीं। अंत में उन्होने कहा कि १२ वर्ष के वनवासकाल में ब्रह्मचर्य के पालन का नियम केवल द्रौपदी के संदर्भ में अपेक्षित है क्योंकि इस नियम का पालन सुनिश्चित करने के कडे नियम द्रौपदी की रक्षा की व्यवस्था के लिए ही है और पाण्डवों को दण्ड देना उसमें अभिप्रेत नहीं है इसलिए अर्जुन को द्रौपदी के संदर्भ में ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा, उलुपी के लिए नहीं !
अब अर्जुन मान गए।
उलुपी के साथ उनका सहवास मात्र १ दिन का रहा और फिर वह अपनी यात्रा के लिए निकल पडे। 
उलुपी ने आगे अर्जुनपुत्र इरावान को जन्म दिया जिसकी  कुरुक्षेत्र के युद्ध में मृत्यु हुई थी।
वह अर्जुन की विवाहिता पत्नी नहीं थी, इसलिए उलुपि ने अर्जुन के साथ वनवास नहीं किया। वह इंद्रप्रस्थ भी नहीं गई जहाँ उसके प्रियतम अगले १२ वर्षों तक ना होते। वस्तुतः उलुपि कभी भी पाण्डवों के कुटुंब का भाग बनकर नहीं रही थी !

इसी वनवासकाल में मणिपुर की राजधानी के निकट उन्होंने दस्युओं को राज्य पर आक्रमण करते देखा। उस राज्य का युवराज यद्यपि सैनिकों को लेकर आ गया था किंतु अर्जुन समझ गए की युवराज ना केवल कोमल है, साथ ही दस्युओं की संख्या और युद्धक्षमता उनसे कहीं अधिक है । अर्जुन ने वनवासीयों से धनुष्यबाण लेकर आक्रमकों को खदेड दिया।

वह युवराज था ही नहीं ! वह मणिपुर के राजा चित्रवाहन की इकलौती संतान राजकन्या चित्रांगदा थी, पुरुष वेश में ! चित्रवाहन वयस्क हो रहे थे इसलिए राज्यरक्षा का भार राजकुमारी पर आ गया था। अर्जुन का परिचय पाते ही चित्रवाहन गदगद् हुए और उन्होने चित्रांगदा से विवाह का प्रस्ताव रखा और अर्जुन से राजा बनने का अनुरोध किया। 
अर्जुन नहीं माने ! 
उन्होंने स्पष्ट किया कि अपनी माता -  भ्राता - पत्नी इनके पास इंद्रप्रस्थ लौटना और सम्राट युधिष्ठिर के छत्र में राज्यसेवा करना ही उनका धर्म है।
चित्रवाहन ने फिर भी विवाह करने का अनुरोध किया और कहा की उनके राज्य का राजा बनने के लिए उनका पहला पुत्र मणिपुर को दे।
उस काल की मान्यता और रिती अनुसार यह धर्मसम्मत था। 
संकट में घिरे राजकुल की सहायता करना भी राजधर्म था। 
इसलिए अर्जुन ने इस अनुरोध को मान्यता दी।
परंतु पुत्र बभ्रुवाहन के जन्म के पश्चात उसे पिता के पास छोडकर अर्जुन के कुटुंब के पास इंद्रप्रस्थ चले जाने के लिए चित्रांगदा का मन नहीं माना और वह मणिपुर में ही रह गई ।
(यह मणिपुर आजकल के पूर्वी भारत का मणिपुर राज्य नहीं हैं । वह मणिपुर उत्तरप्रदेश अथवा उत्तराखंड में था)।

वनवास काल पूर्ण होने के समय अर्जुन मथुरा आ गए थे।
श्रीकृष्ण की छोटी बहन सुभद्रा विवाह बलराम ने दुर्योधन के साथ निश्चित किया था।
श्रीकृष्ण बलराम का प्रकट विरोध कभी भी नहीं किया है यद्यपि अनेकों बार उनके मत भिन्न ही हुआ करते थे। 
किंतु वह दुर्योधन के साथ सुभद्रा के विवाह को अवश्य रोकना चाहते थे और उनकी इच्छाअर्जुन - सुभद्रा विवाह कराने की थी।

उन्होने अर्जुन से कहा कि सुभद्रा जब रैवतक पर्वत पर देवी दर्शन के लिए जाएगी तब उसका अपहरण करें । उन्होने बताया  की वहाँ कृष्ण का शस्त्रसज्ज रथ तैयार रहेगा उसमें वह सुभद्रा को बिठाकर इंद्रप्रस्थ की ओर प्रस्थान करें।
अर्जुन झिझके !
किसी कन्या का इच्छा जाने बिना बलात् अपहरण करने का तो वह सोच भी नहीं सकते थे। परंतु कृष्ण ने उन्हे बता दिया की सुभद्रा की इच्छा को वह रथ में जान पाएंगे। उन्होंने यह भी बता दिया कि यदि सुभद्रा ने अनिच्छा प्रकट की तो उसे बलात् नहीं ले जाना है !

कृष्ण की भगिनी थी सुभद्रा ! 
उन्हे शस्त्रसंचलन आता था। 
कृष्ण जानते थे की यदि सुभद्रा का मन ना माने तो अपहरण के समय वह प्रतिकार अवश्य करेगी।
परंतु अपहरण की घटना से कुपित बलराम द्वारा भेजे गए सैनिकों पर चलनेवाले अर्जुन के बाण देखकर सुभद्रा ने अर्जुन को पहचाना। तब तक वह जानती नही थी की वह कौन है।
और इसके पश्चात सुभद्रा मुग्ध होकर अर्जुन का रणकौशल देखती रही और स्वयं को ऐसे पुरुषार्थसंपन्न पार्थ को समर्पित कर उसने जीवन की सार्थकता का अनुभव किया।

यह सत्य है कि द्रौपदी के अतिरिक्त वह चित्रांगदा और सुभद्रा के पति थे और उन्होने उलुपी का रतिनिमंत्रण स्वीकार किया था।
किंतु इन सारे प्रसंगो में अर्जुन की बुद्धी का समतोल, उनकी धर्मनिष्ठा और कामना / वासनाओं (इच्छा) को नियंत्रित रखने का उनका भाव उजागर होता है ।

स्त्रीसहवास का मोह रखनेवाला व्यक्ति किसी अप्सरा का रतिनिमंत्रण अस्वीकार नहीं करता है ! 
परंतु अर्जुन ने तो साक्षात उर्वशी को भी मना किया था!
अर्जुन दिव्यास्त्रों की प्राप्ती के लिए इंद्रलोक गए थे।
तब देवराज इन्द्र ने उनके स्वागत - सत्कार - मनोरंजन हेतु अप्सरा उर्वशी को उनके पास भेजा। 
किंतु अर्जुन ने उर्वशी का रतिनिमंत्रण स्वीकार नहीं किया। उन्होने कहा की उर्वशी उनके पूर्वज पुरुरवा की पत्नी रहीं है, इसलिए वह पितामही (दादी) है और अर्जुन उन्हे 'स्त्री' की दृष्टी से नहीं देख सकते । उर्वशी ने उन्हे पुन:पुन्हा आग्रह किया कि अप्सराओं के लिए ऐसा स्थायी नाता नहीं होता है अतः अर्जुन को उन्हे नकारना नहीं चाहिए । 
परंतु अर्जुन ने विनम्रतापूर्वक इसके लिए असमर्थता जताई।

आगे अज्ञातवास की समाप्ती पर मत्स्य देश के राज विराट ने कहा कि एक वर्ष तक पाण्डव उनके राज्य में सेवक बनकर रहे इस कारण वह स्वयं लज्जित है । उन्होंने अपनी १४ - १५ वर्ष की पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन से करने का प्रस्ताव दिया ।
इस समय अर्जुन ने कहा कि बृहन्नला के रूप में ही सही परंतु वह उत्तर के (नृत्य) गुरु रहे है और गुरु - शिष्या का संबंध पिता - पुत्री का होता है । अतः वह कन्या से विवाह का अधर्म नहीं करेंगे !
उन्होंने प्रस्ताव दिया कि उत्तरा पाण्डवों के कुल में अभिमन्यू की पत्नी बनकर आए जिससे वह उनकी पुत्रवधू बनेगी और उनका उत्तरा के साथ संबंध पिता पुत्री समान ही रहेगा।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि अर्जुन स्त्री संबंधी आसक्त नहीं थे। पुरुषों के एक से अधिक विवाह उस काल कि पद्धति थी और इसे तत्कालिन समाज की मान्यता थी।
इसे आज का युग के मानकों पर तौलना अन्याय होगा।
क्योंकि घटनाओं की / निर्णयों की / व्यक्ति को आँकने के लिए (to judge) उनके जीवनकाल के मूल्य (principles), समाजपद्धती, उस काल की मान्यताएँ और उस उस व्यक्ति की उस समय की परिस्थिति  समझने पर हम अधिक वस्तुनिष्ठता से उनके व्यक्तित्व को देख पाते है ।

आधुनिक काल के नियम - मान्यताएँ - परिस्थिती के पार्श्व पर (canvas) यह आँकना न्यायपूर्ण नहीं होगा। क्योंकि ऐसा करने से कदाचित सबकुछ अन्याय्य - अधार्मिक और अप्रासंगिक प्रतित हो सकता है।

Hindu Code Bill 1950 लागू होने के बाद हिंदु पुरुषों के लिए एक समय एक ही पत्नी का नियम आया। उसके पूर्व बहुपत्नीत्व को वैधिक  (statutory) मान्यता थी। 
श्रीकृष्ण की ८ पत्नीयाँ थी (यह भी अत्यंत सुंदर कथाएँ है, कभी उस पर भी विचार करेंगे )। 
राजकुल में तो एक से अधिक विवाह किए ही जाते थे क्योंकि वह राजनैतिक दृष्टी से उपयुक्त होते थे ।
हिंदु धर्म में इसका वैसा निषेध भी नहीं है ।
ऋषी याज्ञवल्क्य की दो पत्नीयाँ थी, मैत्रेयी और कात्यायनी ।
ऋषी के साथ उनकी पत्नी देवि मैत्रेयी ने भी वेदों की अनेक ऋचाओं की रचना की है और गुरुकुल में वह भी ज्ञानदान करती थी (woman empowerment की दृष्टी से इसे देखें)।

कुछ अधिक ही विस्तार से लिखना हुआ । परंतु हमारे इतिहास को समझने के लिए उसके मूल में जाकर विचार करेंगे तभी उसकी उदात्तता को भी समझ पाएंगे। यही तो इतिहास समझने की पद्धति है ।
अन्यथा कंबोडिया के Angkor Wat मंदिर के समान हमारा इतिहास भ्रांतियाँ के नीचे दबा रहेगा !


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