हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१८
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ॐ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान्कुरूनिति ।।२५।।
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गीताई ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
मग लक्षूनियां नीट भीष्म- द्रोण- नृपांस तो।
म्हणे हे जमले पार्था पहा कौरव सर्व तू ॥२५॥
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अर्जुन के कथन के अनुसार प्रभु ने रथ को दोनो सैन्यों के बीचोंबीच लाकर खडा किया।
भीष्म - द्रोण आदि के साथ कौरवों की महासेना युद्धसज्ज खडी थी। उनपर दृष्टी डाल प्रभु अर्जुन से कहा, ''हे पार्थ युद्ध के लिए खडे इन सारे कौरवों को देख लो।''
सारथि वह होता है जो स्वयं शस्त्र उठाए बिना युद्ध में विजयी बनाए !
प्रभु श्रीकृष्ण से महान सारथि कौन होगा !
वह जानते थे कि विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर पार्थ मन से कोमल है ।
प्रभु जानते थे कि शस्त्र - अस्त्र चलाना , दिव्यास्त्रों का उपयोग करना यह पार्थ के लिए सहजसाध्य था। वह उनके परिश्रमपूर्व किए गए अभ्यास का और उनकी कठोर तपस्या का फल था।
समस्या यह थी कि पार्थ के शस्त्र दस्युओं पर, अत्याचारियों पर, राक्षसों पर निर्ममता से चल सकते थे, किंतु अपनों पर, सगेसंबंधी - गुरुजनों पर शस्त्र चलाने का प्रसंग आनेपर पार्थ के मन में वह छोटा बालक आ बैठता था जो अपने पितामह से प्रेम और भक्ति करे और गुरु की चरणवन्दना करें !
अज्ञातवास के समय पाण्डवों के मत्स्य देश में छिपे होने की आशंका दुर्योधन को हुई थी तब उसने वहाँ आक्रमण किया और कौरव मत्स्यों का गोधन हांककर ले जाने लगे।
उस कपटी ने त्रिगर्त देश के राजा सुशर्मा की सहायता से त्रिगर्त राज्य की दिशा से मत्स्यदेश पर पहले ही भयंकर आक्रमण कर रखा था जिससे सारी सेना उस दिशा में युद्ध में व्यस्त हो गई थी और देश की दूसरी ओर युद्ध के लिए सेना बची ही नहीं थी।
दुर्योधन जानता था कि अपने आश्रयदाता को संकट में छोडकर स्वयं को बचाने की वृत्ति पाण्डवों की नहीं है । जैसे ही वह हस्तिनापुर की सेना का आक्रमण देखेंगे , छद्मवेष त्यागकर युद्ध करने आएंगे।
वैसा ही हुआ !
बृहन्नला के वेश में पार्थ ने शमी वृक्ष पर रखे अपने शस्त्र संभाले और उनके गांडीव धनुष्य से बाणों की ऐसी भयंकर वर्षी हुई की कौरव सेना को गोधन छोडकर, पराजित होकर हस्तिनापुर लौटना पडा।
उस सेना में दुर्योधन , उसके अनेक भ्राता , कर्ण , शकुनी आदि के साथ पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य और कृपाचार्य भी थे। तब पार्थ के बाणों ने उन्हे बांध अवश्य दिया था, किंतु उनके प्राणों को संकट में नहीं डाला था।
उस युद्ध में भी पार्थ का व्यवहार योद्धा के अनुरूप वीरता का तो था, किंतु उनके मन में पितामह और गुरुजनों के लिए जो सम्मान और स्नेह था वह तो स्पष्ट हो ही गया था।
परंतु वह युद्ध पाण्डवों का अपना युद्ध नहीं था। वह तो चोरों को चोरी से रोकने जैसा था। पाण्डवों की मानमर्यादा और अस्तित्व के लिए नहीं था वह युद्ध। वैसे तब भी कौरवसेना के योद्धाओं के प्राण ना लेने की ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी पार्थ के लिए। परंतु पार्थ ने ऐसा कुछ नहीं किया था ।
परंतु पार्थ की यह भावनाएँ इस युद्ध में विनाशकारी हो सकती थी। अतः श्रीकृष्ण बडी चतुरता से इन भावनाओं की परतें (layers) हटाकर उन्हे युद्ध की ओर उन्मुख कर रहें। वह बता रहे हैं कि 'पार्थ , मोह का त्याग करो और शत्रु को शत्रु के रूप में ही देखो। शत्रु से प्रेम करना योध्दा की भूल होगी क्योंकि ऐसे में शत्रु का वध करने में हाथ कांपेंगे।'
पार्थ को शस्त्रों से आघात और आक्रमण करने के लिए प्रेरित करना यहीं प्रभु का हेतु है । इसलिए अत्यंत चतुरता से वह कह रहे है कि 'पार्थ, देखो सामने सारे कौरव खडे है।'
श्रीकृष्ण बडी युक्ति से भीष्म और द्रोण की गणना कौरवों में कर रहे है।
वह पार्थ को बताना चाहते है कि दुष्टों का साथ देनेवालों को शासन करना भी आवश्यक है। चाहे वह हमारे अति प्रिय - सम्माननीय क्यों ना हो , किंतु यदि वे अधर्म का साथ दे रहे है तो उन्हे भी दण्ड देना ही होगा!
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क्रमश :
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