हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१९
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ॐ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ २६॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । (यह श्लोक २७ का पूर्वाध है)
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
तेथ अर्जुन तो पाहे उभे सारे व्यवस्थित।
आजे- काके तसे मामे सासरे सोयरे सखे ॥२६॥
गुरु बंधु मुले नातू दोन्ही सैन्यात सारखे॥ (हा श्लोक २७ चा पूर्वार्ध आहे)
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दोनो सैन्यों के बीचोंबीच खडे होकर अर्जुन ने उस विशाल सेनासागर पर दृष्टी डाली।
अपने अपने सेनापति द्वारा रचित व्यूह में बद्ध दोनो सेनाएं युद्धभूमि में खडी थी।
किसी भी क्षण युद्ध प्रारंभ हो सकता था ..
कौन किससे भिड़ जाएं और किस पर वार करे यह आनेवाला काल ही बता सकता था ..
युद्धभूमी में वीरों का मन केवल पराक्रम की भावना से भरा नहीं होता है, उसमें कहीं ना कहीं बदला लेने की भावना अत्यंत हिंस्त्र रूप से होती है।
अतः नातेसंबंधों का विचार ताक पर रखकर (keeping aside) कोई भी किसी पर भी शस्त्र उठा सकता था ..
ऐसी स्थिति में अर्जुन ने वहाँ क्या देखा?
अर्जुन ने क्या देखा इस पर विचार करने से पूर्व हम स्मरण कर लेते है कि दुर्योधन ने क्या देखा था।
सामने खडी पाण्डवों की सेना देखकर उसका मन गर्व से फूल गया था कि मेरी सेना ११ औक्षोहिणी है और पाण्डवों की इतनी कम है (७ औक्षोहिणी )..
अर्थात उसके मन में गर्व भरा है और उसके शब्दों से ध्वनित हो रहा है (he is indicating) कि 'युद्ध बस प्रारंभ होने दो, हम तो पाण्डवसेना को किडे-मकोडों के समान कुचल देंगे। उनकी इतनी संख्या है कहाँ की वह हमसे युद्ध कर सके!'
दुर्योधन की दृष्टी 'स्थूल' है (he is judging on macro parameters)। जैसी उसकी बुध्दी हैं उसके कारण वह समझ नहीं पाता है कि संख्याबल से परे (beyond numbers) भी कुछ होता है !
इसके अनेक उदाहरण महाभारत में मिलते है।
पाण्डवों को वनवास के लिए भेजनेपर दुर्योधन के मन में विचार आया कि वह तो वन में निर्धन अवस्था में कष्टपूर्ण जीवन जी रहें है। इसलिए उनके सम्मुख अपने वैभव और सत्ता का प्रदर्शन कर उन्हे लज्जित किया जाए।
उसने रेशमी वस्त्र और अलंकारों से सज्जित अपनी पत्नीयों को, सेवक - सेविकाओं के दल को, अपने अनेक भ्राताओं और उनकी पत्नीयों को साथ लिया। उसके मित्र कर्ण को तो आना ही था और साथ में सेना भी थी।
उसका उद्देश पाण्डवों के सम्मुख अपनी सत्ता व वैभव का प्रदर्शन कर उन्हे लज्जित व निराश करना था। किंतु वहाँ जाकर अपनी दुर्बुद्धी और कलह करने की वृत्ती के कारण दुर्योधन पर बडा संकट आया। वन में उसने चित्रसेन गंधर्व से झगडा मोल लिया। परंतु चित्रसेन की सेना ने दुर्योधन को बंदी बनाया और कौरवों की स्त्रियों का भी हरण कर लिया।
कर्ण घायल हो कर भाग गया।
कौरव सैनिकों ने किसी प्रकार निकट ही निवास कर रहे पाण्डवों से सहायता का अनुरोध किया। तब युधिष्ठिर के आदेश के अनुसार पाण्डवों ने उन सबको मुक्त कराया। कर्ण बाद में वापस आकर कहने लगा की घायल होने के कारण उसे युद्धक्षेत्र छोडकर जाना पडा अन्यथा वह तो गंधर्वसेना को पराजित कर ही देता।
इस प्रसंग में पाण्डवों के पास संख्याबल नहीं था किंतु दुर्योधन के पास था। तब भी तो पराजित ही हुआ था वह !
दूसरा प्रसंग मत्स्यदेश पर आक्रमण कर गोधन चुराने के व्याज से (pretext) पाण्डवों का अज्ञातवास भंग करने का है जिसपर हमने इसके पूर्व चर्चा की है।
एक ओर दुर्योधन की शस्त्रास्त्रसंपन्न प्रचंड सेना थी जिसमें अनेक महारथी - अतिरथी भी थे और दूसरी ओर बृहन्नला के वेश में अकेले अर्जुन !
संख्याबल तब भी तो कौरवों का ही था किंतु वह पराजित हुए थे।
किंतु भूतकाल से कुछ सीखने की दुर्योधन की ना मति है ना इच्छा। उसे अब भी लग रहा है कि उसका सैन्यबल संख्या में अधिक है इसलिए उसका विजय निश्चित है।
और उन्मत्त व्यक्ति के समान ही उसका भाव और भाषा है !
उसने द्रोणाचार्य से कहा कि 'आपके शिष्य' (धृष्टद्युम्न) ने पाण्डव सेना की रचना की है .. उसका भाव गुरु को लज्जित करने का था (he was trying to embarrass his Guru)।
इधर उन्ही दो सेनाओं को पार्थ भी देख रहे है। उनके मन के विचार समझने से हम समझ पाएंगे की सत् और असत् में क्या अंतर है ..
दुर्बुद्धी और विनयी व्यक्ति कैसे पृथक होते है ..
मोहासक्त (लोभी) व्यक्ति और मन से संन्यासी व्यक्ति की विचारधारा (line of thinking) कैसे मूल से ही भिन्न होती है..
पार्थ ने देखा की दोनो सेनाएं व्यूहबद्ध होकर युद्धसज्ज खडी है।
सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है पार्थ, दिव्यास्त्रों के ज्ञाता है, महावीर है, अकेले ही अनेक युद्धो में विजय पायी है उन्होने। किंतु उस युद्धकुशल सेनानी की दृष्टी इस क्षण जाने कहाँ खो गई !
उन्होंने ना व्यूह देखा ...
ना सैनिकों की संख्या देखी...
ना उनमें आवेश जागा...
ना वह क्रुद्ध हुए ...
कौरवों की सेना पर दृष्टी पडते ही अर्जुन के मन में पितामह से प्रेम करनेवाला और गुरु की भक्ति करनेवाला बालक अवतीर्ण हो गया (appeared)...
अपने से वृद्ध और ज्येष्ठ व्यक्तियों के लिए सम्मान जागृत हुआ...
अपने बंधुओं के लिए प्रेम की भावना उनके मन में उमड आयी...
आयु में छोटे (भ्राताओं के) पुत्र और उनके पुत्र देखकर वात्सल्य भाव जागा...
अर्जुन ने देखा कि यह सभी दोनो पक्ष की सेनाओं में है जो आपस में युद्ध करेंगे ...
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क्रमश :
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