हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २२३

जय श्रीराम🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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येषामर्थे काङ्क्षितं  नो राज्यं भोगाः सुखानि च । 
ते इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ।।३३॥
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गीताई ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
ज्यांच्यासाठी अपेक्षावी राज्य भोग सुखें हि ती ।
सजले तेचि युद्धास धनां प्राणांस सोडुनि॥३३॥
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अब अर्जुन अपनी व्याकुलता का जैसे समर्थन कर रहें है ।
वह कह रहें है कि 'सुख सुविधाएँ तो प्रियजनों के लिए जुटाई जाती है। अपने परिजनों के लिए, कुटुंब के लिए विविध प्रकार के सुख साधन जुटाने की इच्छा सबके मन में होती है। और यह स्वाभाविक है कि राज्य प्राप्त होने पर हम भी अपनों को अधिक वैभवपूर्ण जीवन दे पाएंगे। इसलिए हम राज्य प्राप्त करता चाहते थे।
किंतु अब मैं देख रहा हूँ कि जिनको सुखपूर्ण जीवन देने की इच्छा के कारण हम राज्य प्राप्त करने की इच्छा कर रहे थे, आज यहाँ वही सब युद्धवेष धारण कर अस्त्र शस्त्रों सहित युद्ध करने के लिए उपस्थित है।'
अर्जुन देख रहे हैं कि दोनों ही पक्षों की सेना में ऐसे आदरणीय कुलवृद्ध, गुरु और पुत्र - पौत्र है। 
अर्जुन का मन निर्मल है, वह स्वयं भौतिक सुखोपभोगों के मोह से मुक्त है इसलिए उन्हे 'मेरे और उनके पक्ष के लोग' ऐसा अंतर नहीं दिख रहा है। उन्हे लग रहा है कि इनके लिए ही तो हम सुखों के इच्छा कर रहे थे। अब इनकी यदि मृत्यु हो गई तो क्या लाभ है सुख सुविधाएं प्राप्त करने का !
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क्रमश :
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