हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २२६

जय श्रीराम  🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । 
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥ 
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
लोभाने नासली बुद्धी त्यामुळे हे न पाहतीं।
मित्र - द्रोही कसे पाप काय दोष कुलक्षयी॥३८॥
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अर्जुन अब कुछ कुछ दार्शनिकों (philosopher) जैसी बात कर रहे है। वह कह रहें है कि कौरवों का मन तो मोह से ग्रस्त हो गया है, उन्हे सत्ता चाहिए, संपत्ति चाहिए इसलिए वह अविचार से युद्धसिद्ध हो गए है। वह समझ नहीं पा रहें है कि अपने ही कुल का नाश करना कितना बडा पाप है।

हिंदु धर्म के अनुसार वंशवृद्धी यह (गृहस्थाश्रमी) मनुष्य का परम आवश्यक कर्तव्य है।मनुष्यजाति का अस्तित्व कायम रखने के लिए इसे धर्मबंधन बनाया गया है। 
जब वंश की वृद्धी करना यह पवित्र दायित्व माना गया हो तो अपने ही कुल के संबंधियों का वध करना पाप ही कहलाएगा। 
अर्जुन इसी का संदर्भ दे रहे है।

वह मित्रद्रोह का पातक भी देख रहें है। दोनो पक्षों से युद्ध कर रहे राजाओं के नामों की संपूर्ण सूची  हमारे पास नहीं है। किंतु संभव है कि पाण्डवों जब इंद्रप्रस्थ में राज्य कर रहें थे तब उनके मित्र रहे कुछ राजा अब कौरवपक्ष से युद्ध कर रहें हो (दुर्योधन ने इसके लिए उन्हे बाध्य किया हो)। उनसे युद्ध करने को अर्जुन मित्रद्रोह कह रहे है यह संभावना है। 
वैसे उनका सारे कौरव, अश्वत्थामा , कर्ण आदि के साथ भी गुरुबंधु का नाता है क्योंकि सभी गुरु द्रोण के शिष्य है। उनका मन जैसा उदार है , उस देखते हुए यह संभावना है कि अर्जुन को इनसे युद्ध करने का विचार भी पाप ही लगता हो !

अर्थात अर्जुन का मन अब सागर की लहरों पर उपर - नीचे होनेवाली नौका के समान हो गया है। कभी वह विलाप करते है, कभी बालक समान हठधर्मिता करते है, कभी अपने हठ के समर्थन में जैसे ज्ञान की बातें करते है।

अत्यंत मधुर प्रसंग है यह ! क्योंकि अर्जुन के मन के यह सब भावनिक आंदोलन श्रीकृष्ण के सम्मुख निःसंकोच प्रदर्शित हो रहें है। अर्जुन महावीर है , इसलिए उनसे अपेक्षित है कि वह दृढसंकल्प हो, उनके मन में आवश्यक कठोरता हो, शस्त्र चलाने के विचार से उनका मन अथवा हाथ कांप ना जाएं...
इनमें से कुछ भी हो जाएं तो तत्कालीन परिभाषा में वह 'भीरु' (coward) कहलाएंगे। 

परंतु अर्जुन को भय नहीं है कि श्रीकृष्ण उनके लिए क्या सोचेंगे ! उनके मन का प्रत्येक विचार खुली पुस्तक समान वह कृष्ण के सामने रख रहें है !

हमारे लिए कितनी सुंदर सीख है कि अपनी भावनाओं को, दुख और भय को, अपनी इच्छाओं को प्रभु के सम्मुख रख दो, तब प्रभु आपका मार्गदर्शन करने के लिए दौडकर आएंगे।

ऐसा नहीं है कि प्रभु आपके मन की प्रत्येक इच्छा पूर्ण ही करेंगे। वह तो वही देंगे जो आपके हित में है। और वास्तव में प्रभु को कुछ बताने - मांगने की आवश्यकता ही नहीं है ! वह तो अंतर्यामी है, हमारा मन पढ़ लेते है, परंतु करते अथवा देते वहीं है जो हमारे हित में होगा।
किंतु यदि हम अपना दुखडा रोने बैठ ही जाएंगे तो प्रभु सुन भी लेते है जैसे अभी अर्जुन का कथन सुन रहें है।

प्रभु ने अभीतक एक शब्द भी नहीं कहा है। प्रभु धैर्यपूर्वक सबकुछ सुन रहें है।
गंभीर समस्या पर उपाय करने के लिए उसका पूर्ण आकलन आवश्यक है। समस्या की पुनरावृत्ती ना हो इसलिए उसके निर्माण होने की स्थिती समझना भी उपयुक्त होता है। प्रत्येक समय समस्या देखते ही तत्काल उपाय प्रारंभ करना लाभदायी नही होता है। संभव है कि 'तत्काल उपाय' करने का प्रयत्न समस्या की जड तक ना पँहुच पाएं और उपरी सतह पर किया गया उपचार भविष्य में और समस्या उत्पन्न करें।

जैसे , घर में दीमक (termite) लगने पर केवल उपर दिखनेवाली दीमक को फेंकना उपाय नहीं है। औषधी डालकर दीमक को मूल से नष्ट करना अत्यावश्यक है । उसी प्रकार मनुष्य के निर्णय बदलने के लिए उसे आज्ञा करना और वह कार्य करवा लेने से अधिक आवश्यक है कि उसकी सोच और समझ की दिशा को बदलना। 
प्रभु यही करनेवाले है । इसलिए वह अर्जुन की बातें शांतिपूर्वक सुन रहें है !
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क्रमश :
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