हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २३२

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन। 
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।।४४।।
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गीताई ( मराठी अनुवाद: आचार्य विनोबा भावे )
ज्यांनी बुडविले धर्म कुळाचे त्यांस निश्चित।
नरकी राहणे लागे आलो ऐकत हे असे॥४४॥
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अध्याय १ :श्लोक ४४ : भाग १

अर्जुन कह रहें है कि जो व्यक्ति कुलधर्म का पालन नहीं करता है उसके लिए नर्क की यातनाएँ निश्चित है ऐसा हमें बताया गया है।

अब स्वर्ग किसने देखा है ?
और फिर नर्क भी किसने देखा है ?
तो इन कल्पनाओं पर क्यों और कैसे विश्वास करें ?

गीता का अर्थ अनेकों बार केवल शब्दार्थ से अधिक है। क्योंकि गीता में किसी भी काल्पनिक और आदर्श सृष्टी में मनुष्य का व्यवहार कैसा हो इस पर भाष्य नहीं है, बल्कि प्रत्येक सामान्य व्यक्ति के जीवन में आनेवाले सुख - दुख - संकट आदि परिस्थितियों में मनुष्य की सोच और व्यवहार कैसा होना चाहिए इसका मार्गदर्शन है क्योंकि यह सारी परिस्थितियाँ मानव जीवन का अभिन्न अंग है। 
किसी भी व्यक्ति का जीवन पूर्णतः सुखों से भरा नहीं होता है। मनुष्य धनी हो या निर्धन हो, शिक्षित अथवा अशिक्षित हो, सामान्य हो अथवा समाज का अति सम्मानित व्यक्ति हो, कठिन परिस्थिती और संकट प्रत्येक मनुष्य के  जीवन में आते ही है । 
गीता हमें उपदेश करती है कि सुख और दुख दोनो ही स्थितियों में मन को कैसे संतुलित रखना है। 
इसलिए इस श्लोक के अर्थ को शब्दों के पार जाकर समझना उचित होगा।

सनातन हिंदु धर्म विविध ऋणों को मानता है जैसे मातृपितृ ऋण, गुरु ऋण, समाज ऋण आदि। 
ऐसा क्यों है ?
क्योंकि हिंदुधर्म व्यक्ति को समाज के घटक के रूप में देखता है। हमारी मान्यता है कि किसी भी बालक के पालनपोषण का मुख्य दायित्व उसके माता - पिता और परिवार का होता है परंतु गुरु का स्थान भी मातापिता के समान है। साथ ही समाज भी बालक पर प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से संस्कार करता है , उसकी शिक्षा और जीविका (education & livelihood) के लिए साधन उपलब्ध कराता है। इसलिए समाज के प्रति भी मनुष्य का दायित्व होता है । 
इन सभी दायित्वों को पूर्ण करने के लिए के लिए वृत्ती में नम्रता और सेवाभाव चाहिए। अपने कर्तव्य के प्रति आस्था और उसे पूर्ण करने के लिए निश्चय और समर्पणभाव चाहिए।
और वर्णसंकर से उत्पन्न संतति में इनका अभाव होने के कारण और परिणामों पर हमने इससे पूर्व विचार किया था।

यहाँ अर्जुन की चिंता केवल वर्णसंकर से उत्पन्न पिढी के लिए नहीं है । वह कह रहें है कि ऐसे वर्णसंकर का कारण बननेवाला भी पापी होता है जिसे मृत्युपश्चात नर्क मिलेगा।

स्वर्ग और नर्क इस संकल्पनाओं पर और थोडा विचार हमारे लिए उपयुक्त होगा जिसे हम अगले भाग में देख सकते है ।
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अध्याय १ः श्लोक ४४ : भाग २ 
क्रमश :
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