हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २३१
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥४३॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
या दोषांनी कुलघ्नांच्या होउनी वर्ण संकर।
जातीचे बुडती धर्म कुळाचेही सनातन॥४३॥
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अध्याय १ : श्लोक ४३ : भाग २
पिछले भाग में हमने वर्णसंकर के कारण कुल और समाज पर होनेवाले कुछ अनिष्ट परिणामों के संदर्भ में विचार किया था ।
क्या इसका अर्थ यह होगा कि ऐसे नकारात्मक परिणाम केवल वर्णसंकर से उत्पन्न संतति से ही होते है?
नहीं !
समाजमान्य व्यवस्था (अर्थात विवाह) से उत्पन्न होनेवाली संतति में भी ऐसे अवगुण हो सकते है।
महाभारत में ही दुर्योधन का उदाहरण है जो इस संपूर्ण युद्ध का और अनेक परिवारों के वंशच्छेद का कारण बना था।
दुर्योधन के लिए नैतिक - अनैतिक इसमें कोई अंतर नहीं था, उसमें केवल सत्ता - संपत्ति प्राप्त करने की स्वार्थी भावना थी।
महान त्यागमूर्ति देवव्रत भीष्म जिस कुल से थे उसी कुरुकुल की औरस (legitimate) संतान थी दुर्योधन! किंतु उसे कुलपरंपरा के प्रति कोई आस्था नहीं थी ।
किंतु दुर्योधन यह नियम का अपवाद है , नियम नहीं !
दुर्योधन में राक्षस तत्व का प्रमाण अधिक था। परंतु साधारणतया 'मनुष्य' श्रेणी के जीव ऐसे नहीं होते हैं।
महाभारत में ही दुर्योधन की करनी को अपवाद सिद्ध करने के लिए कितने उदाहरण है -
महर्षि व्यास !
ऋषि पराशर और धीवर की पालिता पुत्री सत्यवती का पुत्र। यह सत्यवती का कानीन पुत्र था (विवाहपूर्व संतान)। सत्यवती ने बालक को जन्म दिया किंतु ऋषि के साथ गृहस्थी नहीं बसाई। विवाह उन्होने हस्तिनापुर के राजा शांतनु से किया। इधर 'कृष्ण द्वैपायन व्यास' (इनके श्याम = साँवले वर्ण के कारण यह नाम दिया गया) का पालनपोषण पिता ऋषि पराशर ने अत्यंत प्रेम से किया था । महर्षी व्यास मातृप्रेम से वंचित रहे थे , किंतु ऋषि पराशर के मन में सत्यवती के लिए नकारात्मक भावनाएँ नहीं थी इसलिए पिता की उदात्त विचारसरणी ने महर्षि व्यास को भी स्थिरचित्त बना दिया।
आगे सत्यवती के दोनो पुत्रों की जब संतानोत्पत्ती से पूर्व ही मृत्यु हो गई तब सत्यवती ने अपने इस पुत्र से बहुओं के साथ 'नियोग' (The then prevalent practice of sperm donation through physical relation for the limited purpose of fathering a child to ensure continuity of lineage) करने का अनुरोध किया और महर्षि ने इसे अपना कर्तव्य मानकर पूर्ण किया ।
दूसरा उदाहरण है गंगापुत्र भीष्म का ! हस्तिनापुर के युवराज थे देवव्रत । युवा , कुशल योद्धा - महावीर , प्रजा का लाडला युवराज। देवव्रत की पत्नी बनकर कोई भी राजकुमारी अपने ही भाग्य पर इर्ष्या करती। परंतु पिता शांतनु को स्त्री मोह ने ग्रास लिया और देवव्रत ने अखंड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा कर ली।
हस्तिनापुर के राज्य के अधिकारी थे देवव्रत...
यदि उन्हे साम्राज्य की आकांक्षा होती तो पिता तक उन्हे रोक नहीं पाते...
हस्तिनापुर के राजवैभव के मध्य में देवव्रत भीष्म संन्यासी समान वैराग्य का जीवन जीते रहे...
उन्होने चित्रागंद या विचित्रवीर्य से कभी नही कहा की उनके कारण वह राज्य से वंचित हुए है। विचित्रवीर्य की मृत्यु के पश्चात नियोगविधि से धृतराष्ट्र व पाण्डु का जन्म व पाण्डु की युवावस्था तक साधारणतया दो तपों तक (१ तप = १२ वर्ष) राज्य का पूर्ण भार भीष्म पर था। किंतु पाण्डु के युवा होते ही भीष्म ने उन्हे राज्य सौंप दिया था। राज्यलक्ष्मी का मोह उन्हे ना पहले था ना बाद में आकृष्ट कर पाया।
तीसरा उदाहरण है कुन्ती का।
मथुरा के राजवंश से संबंधित कुल में उनका जन्म हुआ था। परंतु पिता ने उन्हे राजा कुन्तिभोज को गोद दिया। कुन्ती का पालनपोषण उनके सगे मातापिता के रहते भी दूर देश के अपरिचित कुल में हुआ था। दत्तक पिता ने दुर्वास जैसे अति कोपिष्ट (संतापी) ऋषि की व्यवस्था का दायित्व अबोध (innocent) कुन्ती को सौंप दिया। ऋषि ने भी उस बालिका की अवस्था और आकलनशक्ति / प्रगल्भता (maturity) के विषय में सोचे बिना उसे वर दिए जिससे बेचारी कुन्ती पर अविवाहित माता बनने का दुर्भाग्य टूट पडा।
आगे भी पाण्डु की शारिरीक अक्षमता के चलते कुन्ती को ना तो गृहस्थी का सुख मिला ना ही वह राजकुल की राजरानी बनी रही।
किंतु कुन्ती महाभारत काल में ही नहीं, अपितु प्रत्येक युग की परम आदरणीय व्यक्तिरेखा है।
और फिर श्रीकृष्ण !
उनका जीवन भी सामान्य नहीं था। जन्मदाताओं से बिछडकर उनका बचपन बीता था। यद्यपि वह मथुरा के राजकुल से संबंधित थे, किंतु उनका बचपन ग्वाले - ग्वालिनों के मध्य गुजरा था। उन्हे वसुदेव - देवकी का पुत्र होने का उनका परिचय प्राप्त होनेपर भी अनेक अहंकारी लोग उनके ग्वाला (milkman) होने के वास्तव को गाली समान उछालते रहे।
किंतु कृष्ण ने इन सब अपमानों के मध्य रहकर भी अपनी सहज स्वाभाविक मधुरता को बनाएं रखा था।
यह कुछ ऐसे उदाहरण है जिनपर स्वतंत्र ग्रंथ लिखे जा सकते है। महाभारत में ही ऐसे और कितने उदाहरण है, जैसे :
जरासंध के पुत्र सहदेव पिता के विरुद्ध स्वभाव के थे जिन्होने पाण्डवों की धर्मप्रियता और श्रीकृष्ण की महत्ता का मान रखा था।
शिशुपाल की पुत्री करेणुमति पाण्डवों के घर सहदेव की पत्नी बनकर आयी और पाण्डवों के परिवार में एकरूप हो गई। उसने पिता समान व्यवहार कभी नहीं किया था।
हिडिंबा राक्षस कुल से थी। परंतु उसका व्यवहार अपने अत्याचारी भाई हिडिंब जैसा नहीं था।
रामायण के बिभीषण जैसे अपने भाई रावण को छोड राम के पक्ष में आए थे वैसेही दुर्योधन का भाई युयुत्सु पाण्डवों के प्रति प्रेमभावना रखता था। अंततः कुरुक्षेत्र के युद्धसमय उसने पाण्डव पक्ष चुना था।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि व्यक्ति की अच्छाई उसका अपना निर्णय होता है।
किंतु कुलपरंपरा, वैभव, मातापिता द्वारा प्रेम और अपनत्व इतनी अधिक अनुकूलताओं से भरे परिवेश (environment) में भी यदि दुर्योधन के मन में द्वेष कूट कूट कर भरा हो तो जो व्यक्ति कुल की पहचान से, माता पिता के सहज प्रेम से, समाज मे सम्मानित स्थान से वंचित हो उनकी वृत्ती में हिंसकता, नृशंसता, प्रतिशोध (revenge) लेने की बुद्धी और स्थापित समाज की व्यवस्थाएँ परंपराओं को ध्वस्त कर अन्य लोगों से अपना स्वामित्व मान्य कराने की विकृत आकांक्षा अधिक मात्रा में होना आश्चर्यजनक नहीं है ।
अतः वर्णसंकर के कारण कुल व समाज दोनों पर होनेवाले परिणामों से अर्जुन चिंतित है।
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क्रमश :
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