हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २२८

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । 
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
कुल-क्षये लया जाती कुल धर्म सनातन।
धर्म - नाशें कुळीं सर्व अधर्म पसर मग  ॥४०॥
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अर्जुन केवल वैयक्तिक अधःपतन (degradation) के लिए चिंतित नहीं है , वह युद्ध के सामाजिक परिणामों पर भी बात कर रहें है।
वह कह रहें है कि युद्ध के कारण समाज की भी हानि होती है । युद्ध के कारण कुटुंब (family) पर परिणाम होता है और अनेक परिवार जब इस प्रकार युद्ध की चपेट में आ जाते है तब समाज में भी हानिकारक परिवर्तन होते है।
उनका कहना है कि युद्ध में जब परिवार के (प्रमुख) व्यक्तियों की मृत्यु होती है तब वह परिवार अपने धर्म के अनुसार कार्य करने की क्षमता (व इच्छा) खो सकता है। इस प्रकार अनेक कुटुंब जब धर्मपालन से विमुख (दूर) हो जाते है तब समाज में अधर्म बढ़ने लगता है ।

श्रीमद् भगवद्गीता हजारों वर्ष प्राचीन है। इसका उपदेश कालातीत (timeless) है किंतु इसमें प्रयुक्त (used) शब्दों के अर्थ आधुनिक भाषा / समझ से भिन्न हो सकतें है जैसा इस श्लोक के साथ होने की संभावना (possibility) है।

अर्जुन ने कहा है कि कुल - क्षय होने से कुल के धर्म की रक्षा ना होने का भय है। 
यहाँ 'धर्म' शब्द का अर्थ पूजा / उपासना / प्रार्थना / यज्ञ / हवन / अन्य धार्मिक आयोजन नहीं है !

हिंदु धर्म में 'धर्म' इस शब्द के अनेक अर्थ है। यहाँ धर्म का अर्थ 'कर्तव्य' है।
सनातन हिंदु धर्म और परंपरा में प्रत्येक व्यक्ति का कुछ कर्तव्य होता है। यह कर्तव्य उस व्यक्ति की शिक्षा (education) , क्षमता (skill-set & capacity) , स्वयं को परिस्थितिनुरूप ढालने की शक्ति (adaptability), अनुभव आदि अनेक घटकों पर निर्भर करता है।

उदाहरण के लिए जिस व्यक्ति का जन्म मछुआरे अथवा नाविकों के कुल में हुआ हो उसमें नाव चलाने की क्षमता होगी। आजिविका के लिए वह मछली पकडकर बेचगा अथवा यात्रियों को नदीपार ले जाकर धन कमाएगा। यह उसका व्यवसाय हुआ।
किंतु युद्ध की / शत्रु द्वारा आक्रमण की स्थिति होने पर अपनी सेना को सुरक्षित और जलद नदीपार कराना, हाथी - घोडे - रथ आदि को दूसरे किनारे पर ले जाने के लिए कम गहराई वाले स्थान की जानकारी देना अथवा शत्रुसेना को रोकने के लिए नदी पार करने के उनके संभावित मार्ग को ढूंढकर अपने सैन्य अधिकारियों को बताना उसका धर्म (कर्तव्य) हुआ !

अथवा युद्ध की स्थिति में तलवार, भाला जैसे अनेक हथियार अधिक मात्रा में बनाने होते है । साधारणतया लुहार के घर के सभी स्त्री पुरुष इस निर्माणप्रक्रिया को जानते ही है। लुहार का काम उस व्यक्ति का व्यवसाय हुआ। और युद्ध होने पर परिवार के प्रत्येक सदस्य ने शस्त्रनिर्मिति के लिए काम करना यह उस कुटुंब का धर्म (कर्तव्य) हुआ।

राजा / सताधारी यदि अन्याय करते है तो उन्हे दण्ड देना यह न्यायाधीश का भी धर्म (कर्तव्य) है। इसका प्रेरणादायी उदाहरण महाराष्ट्र के इतिहास में है।
माधवराव पेशवे के अकालमृत्यु के पश्चात उनके कनिष्ठ भ्राता नारायणराव को 'पेशवा' (मराठों के राज्य के प्रधानमंत्री ) बनाया जाना निश्चित था। किंतु उनके चाचा रघुनाथराव पेशवे को पेशवा पद का मोह था। इसलिए एक कारस्थान कर नारायणराव की हत्या की गई। राज्य के न्यायाधीश रामशास्त्री प्रभुणे निर्भिक थे। उन्होंने रघुनाथराव को अपराधी बताया और कहा की वह इस अपराध के लिए रघुनाथराव को देहान्त प्रायश्चित देना आवश्यक मानते है। 
इतने बलशाली (powerful) नेता को इस प्रकार देहान्त प्रायश्चित सुनाने का धैर्य रामशास्त्रीजी को उनके कर्तव्यबोध (dedication towards duty) ने दिया क्योंकि न्यायाधीश का कार्य प्रामाणिकता से करना वह अपना धर्म (कर्तव्य) मानते थे !

अर्जुन का कहना है कि कुल क्षय होने से विशिष्ट प्रकार के कार्यो - गतिविधियों में उस व्यक्ति व उसके कुटुंब ने जो ज्ञान और अनुभव अर्जित किया है वह नष्ट हो जाता है। क्षमता का अंत होने के कारण उनके परिवार के बाकी सदस्य अपना परंपरागत व्यवसाय छोड कर आजिविका (livelihood) के लिए कुछ अन्य काम ढूंढने के लिए बाध्य (compelled) हो सकते है । ऐसे में ना उनके पुराने व्यवसाय की परंपरा उनके पास बचती है , ना ही नए व्यवसाय की परंपरा को वह जानते है या उस निभाने की क्षमता अभी उनके पास है। 
इसलिए वह दोनों ही परंपरा के प्रति गंभीर (dedicated ) नहीं होते है। ऐसे में उनका कर्तव्यबोध भी धीरे धीरे नष्ट होता है।
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क्रमश :
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