हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २३६
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नम
श्रीमद् भगवद् गीता : अध्याय २
.................................................
सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ।।१।।
................................................
गीताई ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
संजय म्हणाला
असा तो करुणा ग्रस्त घाबरा अश्रु गाळित ।
करीत असतां खेद त्यास हे कृष्ण बोलिला॥१॥
................................................
दूसरे अध्याय के प्रारंभ में संजय धृतराष्ट्र को बता रहें है कि अर्जुन अत्यंत हताश मनस्थिति में, भयाक्रांत होकर, अश्रुपूरित नयनों से (tearful) युद्ध की संकटपूर्ण स्थिति के लिए शोक कर रहें थे ऐसी स्थिति में श्रीकृष्ण उनसे कुछ कहते है...
इस श्लोक में अर्जुन का वर्णन देखिए। यह किसी अत्यंत भीरू (coward), पुरुषार्थहीन, निराश और अकर्मण्य व्यक्ति का वर्णन है।
अर्जुन तो ऐसे नहीं थे।
किंतु जैसे अजगर अपने भक्ष्य को पूर्णतः लपेटकर उसपर बल डालकर उसे निचेष्ट (lifeless) कर देता है वैसे ही अर्जुन की निश्चयी और निर्भिक (fearless) वृत्ती और उनके पुरुषार्थसंपन्न और युद्धकुशल व्यक्तित्व को परिजनों के मोह ने पूर्णतः जड/चेतनाहीन (= motionless) कर रखा है।
युद्ध में होनेवाले भयंकर संहार की कल्पना से वह भयव्याप्त (fearful) हो गए है।
स्वजनों के मृत्यु का कारण बनने की कल्पना से उनकी आँखो से अश्रुपात हो रहा है।
अर्थात, वह युद्ध की अपरिहार्यता समझते हैं फिर भी उसे नकारना चाहते है।
यह हम सामान्य मनुष्यों के जीवन का प्रतिबिंब है !
हमारे जीवन में अनकों बार ऐसी स्थिति आती है जब हमें आपसी संबंधों का मोह त्यागकर धर्म अर्थात न्याय व सत्य की रक्षा के लिए आवाज उठाने की, निर्णय लेने की अथवा प्रत्यक्ष कृति करने की आवश्यकता होती है, किंतु हम डर जातें है, पीछे हट जाते है, चुप्पी साध लेते है क्योंकि विरुद्ध पक्ष में आपके प्रिय व्यक्तियों में से ही कोई है !
ना हमें राज्य प्राप्त करना है ना ही भीम समान दुर्योधन की जंघा चीरकर रक्त प्राशन करना है, हमारे अस्तित्व का घेरा ही इतना छोटा है कि हमारे प्रश्न और समस्याएँ भी छोटी ही होंगीl
जैसे हमारे पडोसी कचरे जमा करने की गाडी आती है उसमें कचरा ना डालकर आसपास कहीं फेंक रहें है ..
हमारी हाऊसिंग सोसायटी में लगाएं हुए पेड - पौधों को कोई नुकसान पँहुचा रहा है अथवा उनके फूल स्वयं के लिए तोड रहा है ..
हमारी हाऊसिंग सोसायटी के पदाधिकारी धन का दुरुपयोग कर रहें है(misappropriation of funds)..
सार्वजनिक स्थान पर (बस स्टॅण्ड, रेल्वे स्टेशन, विवाह मंडप आदि) कोई धूम्रपान कर रहा है..
हमारे परिचित किसी घर में यौतुक (dowery) मांगा जा रहा है..
कार्यालय का कोई व्यक्ति घूस (bribe)ले रहा है अथवा सहकारियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहा है..
पहले विचार में कदाचित हम यह सोचे कि इतनी छोटी, रोजमर्रा की स्थितियों में गीता का क्या संबंध है ?
यह तो सबके साथ होता है, तो का प्रत्येक क्षण बखेडा खडा कर दें या हर समय आवाज उठाकर अपनी ही मनःशांति भंग करते रहे ?
यदि भगवद् गीता पर श्रद्धा है तो समस्याएँ / संकट छोटा हो या बडा, किंतु धर्म रक्षा के मूलतत्व ही हमारे निर्णय का आधार होना चाहिए यह साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का वचन है !
संबंधियों के, कार्यालय के वरिष्ठों के अथवा अपरिचितों के क्रोध से घबराकर चुप रहना यह उपाय नहीं है, अपने मन को कडा कर मानसिक यातना को दूर रखने का कौशल सीखना यह उपाय है !
क्योंकि यदि हम भगवान श्रीकृष्ण में श्रध्दा रखते है और श्रीमद् भगवद् गीता को परम श्रद्धेय मानते हैं तो, ऐसी कठिन स्थितियों में भी न्याय के पक्ष में तनकर खडा होना यही हमारा कर्तव्य है !
................................................
क्रमश :
................................................
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें