हिंदु धर्मसंस्कार🚩 : भाग २२१

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ॐ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । 
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।।३१।।
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
कृष्णा मी पाहतो सारी विपरित चि लक्षणे ।
कल्याण न दिसे युद्धी स्व- जनांस वधूनिया ॥३१॥
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हमने भी कभी यह अनुभव किया होगा कि हम आवेश में कोई निर्णय लेते है , किंतु उस निर्णयानुसार कार्य करने का प्रसंग आनेपर हमें अपने निर्णय पर ही संदेह होने लगता है। अथवा हमने उद्देश / साध्य (aim) निश्चित करते समय यह नहीं सोचा था कि इस निर्णय को पूर्ण करने के मार्ग में क्या क्या हो सकता है।
अथवा निर्णय लेते समय हमने मन को कड़ा कर लिया था क्योंकि हम उस कार्य को अत्यावश्यक मानते थे , किंतु जब देखा कि उस प्राप्य (goal) के लिए अनेक अप्रिय कृत्य करना अत्यावश्यक होगा तब हम अपने निर्णय से ही पीछे हटना चाहते है ।

अर्जुन की स्थिति कुछ ऐसी ही है।
उन्होने अपने जीवन में शांति, सुखोपभोग का समय कदाचित ही कभी देखा है।
पाण्डवों का जन्म वन में हुआ था जहाँ वह अपनी बाल्यावस्था में रहें थे। यह समय शांतिपूर्ण  था क्योंकि वह अपने माता पिता के साथ थे।
अपने पिता की मृत्यु के पश्चात १३ - १४ वर्ष के अर्जुन अपने कुटुंब के साथ हस्तिनापुर लौटे थे। हस्तिनापुर के राज्य के उत्तराधिकारी युधिष्ठिर थे क्योंकि उनके पिता ने धृतराष्ट्र को राज्य दिया नहीं था, वह अपनी संभावित नपुंसकता से निराश होकर वन में चले गए थे। तब भी उन्होने धृतराष्ट्र से नहीं कहा था की वह राज्य उन्हे दे रहें है। 
आशा सबके मन में होती है !
पाण्डु ने भी सोचा होगा कि कदाचित उन्हे कोई उपाय मिलेगा, उनकी भी वंशवृद्धी होगी, तब वह हस्तिनापुर लौटकर पुनः राज्य संभालेंगे और अपने वंशजों को राजपद संभालने की शिक्षा देंगे !

परंतु धृतराष्ट्र ने इस स्थिति का अनुचित लाभ उठाया। उनका राज्याभिषेक कभी भी नहीं हुआ था किंतु उन्होने राजपद हथिया लिया और मन से दुर्योधन को युवराज भी मान लिया।

पाण्डवों के लौट आते ही पितापुत्र दोनों ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के विफल होने का संकट देख लिया। इसलिए महारानी कुन्ती और पाण्डवों को उपेक्षित रखा गया। प्रत्यक्ष रूप से संभव नही था इसलिए अप्रत्यक्ष रूप से उनका अपमान किया जाता रहा।
पाण्डवों के लिए यह समय कठिन तो था किंतु कुन्ती का उदार मन और उनके उदात्त संस्कारों के आधार पर पाण्डव इसे भी सहते रहे।

हस्तिनापुर का वास्तव्य में उन्होंने द्रोणाचार्य से शस्त्र - अस्त्र विद्या अर्जित की। किंतु सामान्य विद्यार्थी दशा के समान यह काल उनके लिए केवल आनंदादायी / निर्मल नहीं रहा होगा ऐसा माना जा सकता है। इस काल में उनके लिए मानसिक यंत्रणा (Mental stress) भी रहीं होगी। क्योंकि दुर्योधन और उसके भ्राता - मित्र भी वहीं उसी पाठशाला में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। जैसी दुर्योधन की प्रवृत्ति रहीं है , उसने 'मैं राजा, तुम आश्रित' वाला व्यवहार पाण्डवों से किया होगा यह संभव है।

इस काल में भीम को विष देकर मारने का प्रयत्न दुर्योधन ने किया जो विफल हुआ। पुनः जब उसने ऐसा ही कारस्थान किया तब दुर्योधन के (सौतेले) भ्राता युयुत्सु ने पाण्डवों को सावधान किया था।

इसे पश्चात वारणावत में लाक्षागृह ( highly inflammable - लाख का भवन) बनाकर पाण्डवों को जलाकर मारने का प्रयत्न दुर्योधन ने किया। 
यहाँ से बच निकले पाण्डव और महारानी कुन्ती पांचाल देश की राजधानी कांपिल्य में पँहुचे जहाँ अर्जुन ने द्रौपदी स्वयंवर में विजय प्राप्त की। किंतु निराश हुए अन्य राजाओं ने इस विजयी वीर पर आक्रमण किया जिसे वीर अर्जुन और भीम ने विफल किया। दुर्योधन और कर्ण इस संग्राम में भीम - अर्जुन के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे ।

इसके बाद युवराज युधिष्ठिर को सम्मानपूर्वक हस्तिनापुर का राजा ना बनाते हुए धृतराष्ट्र ने उन्हे खण्डहर सा इन्द्रप्रस्थ दिया।
अत्यंत कष्टपूर्वक पाण्डवों ने इसे वैभवशाली राज्य बनाकर राजसूय यज्ञ किया।
किंतु दुर्योधन का द्वेष चरमसीमा पर था इसलिए उसने द्यूतक्रिडा में कपट से पाण्डवों का राज्य हरण कर अपमानित किया।
पाण्डवों के अज्ञातवास के समय दुर्योधन ने मत्स्यदेश पर आक्रमण किया। वह चाहता था कि पाण्डवों का वास्तव रूप प्रकट हो जाए और पूर्व स्वीकृत शर्तों के कारण उन्हे पुन: वनवास और अज्ञातवास करना पडे।
यह सब नहीं हो पाया तो कपटी दुर्योधन ने अपने वचन को तोड दिया और पाण्डवों को उनका राज्य लौटाने से मना कर दिया। राज्य के बदले कोई भी पाँच गाव देने का पाण्डवों का प्रस्ताव भी उसने ठुकरा दिया और अत्यंत औद्ध्यत्य (aggressiveness) दिखाकर कह दिया कि 'सुई की नोंक जितनी भूमि भी नहीं दूंगा।'

संधिप्रस्तावों की कोई संभावना नहीं बची थी। पाण्डवों के पास ना अपना घर था ना आजिविका का कोई साधन था। इस कारण वह युद्ध के लिए विवश हो गए।

इस सारी पार्श्वभूमि में अर्जुन युद्धक्षेत्र में खडे है। ऐसी स्थिति में साधारण व्यक्ति का मन आक्रोश से भरा हो सकता है और दीर्घ काल तक केवल अन्याय सहने के कारण वह अत्यंत क्रोधित होकर शत्रु पर टूट पडें तो वह भी समर्थनीय माना जा सकता है !

परंतु अर्जुन सामान्य नहीं हैं !
युद्ध के पर्याय को स्वीकारते समय वह जानते थे कि किनसे युद्ध करना है। मगर बात तो धर्मस्थापना की थी, दुर्योधन के अधर्मी अत्याचारी मार्ग को रोकने की थी, इसलिए अर्जुन ने मन कडा कर युद्ध करने के लिए हामी भर दी !
परंतु अब, जब उन्होंने सेना देखी तो उनके मन में लावा नहीं फूट रहा है कि यह सब दुर्योधन का साथ क्यों दे रहें है !
उन्हे यह भी स्मरण नहीं रहा कि युद्ध ना करने पर पाण्डव निर्धन और निराश्रित रहेंगे !
अर्जुन अत्यंत व्याकुल होकर श्रीकृष्ण से कह रहें है कि 'यह कैसे समर्थनीय होगा ? यह धर्म के विरुद्ध होगा ! इस युद्ध में अपनों की मृत्यु का कारण बनना हमारे लिए कैसे कल्याणकारी हो सकता है ? '
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क्रमश :
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