हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २२०

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
-----------------------------------------------------------
श्लोक २७ का उत्तरार्ध :
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥२७॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । (श्लोक २८ का पूर्वार्ध)

अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥२८॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥२९॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ।॥३०॥

----------------------------------------------------------
गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
         
असे पाहूनि तो सारे सज्ज बांधव आपुले।।२७॥
अत्यंत करुणाग्रस्त विषादे वाक्य बोलिला ।

अर्जुन म्हणाला
कृष्णा, स्वजन हे सारे युध्दी उत्सुक पाहुनि ॥२८॥
गात्रे चि गळती माझी होतसे तोंड कोरडे ।
शरीरीं सुटतो कंप उभे रोमांच राहती ॥२९॥
गांडीव न टिके हातीं सगळी जळते त्वचा ।
न शके ची उभा राहू मन हे भ्रमले जसे ॥३०॥
---------------------------------------------------------
भगवद् गीता तो साक्षात प्रभु के द्वारा दिया गया दिव्य ज्ञान है ।
मनुष्य की बुध्दी और मति पर जमीं धूल हटाकर उसे पुनः कर्तव्योन्मुख करने के लिए (to inculcate sense of responsibility & make one work towards fulfillment of duty) प्रभु के द्वारा की गई मधुर ताडना (sweet scolding) है ।

किंतु प्रभु को अर्जुन को उपदेश करने के लिए बाध्य होना पडा इसका कारण कितना मधुर और कितना निर्मल है !

महारथी अर्जुन..
महापराक्रमी अर्जुन..
युद्धकुशल अर्जुन..
युद्धनीतितज्ञ अर्जुन..
विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन..

यह सारे गुण अचानक ऐसे विलुप्त हो गए जैसे अपने पूर्ण तेज से प्रभा बिखेरते सूर्य के सामने काले मेघों का परदा आ जाए !
अर्जुन रणवेश में खडे है ..
उनका रथ शस्त्रास्त्रों से भरा है ..
इसी दिन की आशंका से उन्होने कठोर तपस्या कर अनेक दिव्यास्त्र  प्राप्त किए है ..
अभी थोडे समय पूर्व वह आवेश में शत्रुसेना का नाश करने की भाषा बोल रहे थे ..

किंतु अब, कौरव पक्ष में खडे कुलवृद्ध, गुरुजन, बंधु, पुत्र,पौत्र इन्हे देखकर पार्थ के मन में प्रेम की लहरें उठने लगी है..
इन सबसे युद्ध करने की कल्पना तक वह सहन नहीं कर पा रहें है...
इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि इनसे युद्ध करने की कल्पना मात्र से मेरा शरीर जैसे चेतनाहीन हो रहा है, ऐसा लग रहा है कि मेरे शरीर में शक्ति नहीं रही, मेरा मुख सुख रहा है...

क्या पार्थ की यह अवस्था मनमोहक नहीं है ?
वह जानते है कि युद्ध में विजय प्राप्त करने पर हस्तिनापुर का राज्य पाण्डवों का होगा...
वह जानते हैं कि हस्तिनापुर का राज्य प्राप्त करने के लिए इस युद्ध के अलावा अन्य कोई पर्याय नहीं है...
श्रीकृष्ण का छत्र रहते उन्हे युद्ध में विजय का पूर्ण विश्वास भी है...
किंतु अपनों को सामने देखकर अर्जुन एकदम हतोत्साहित हो गए है। वह कहने लगे है कि इनसे युद्ध करना तो मेरे लिए संभव ही नहीं है, यह तो मेरे परिजन है, इनसे युद्ध कैसे करुं ?

पार्थ का यह मोह कितना सुंदर है ! कितना सुंदर !

मोहग्रस्त दुर्योधन भी है , उसे सत्ता का मोह है , सत्ता के कारण मिलनेवाले अधिकार और सम्मान का मोह है...
उसे सम्पत्ति का मोह है , सम्पति के कारण मिलनेवाली सुख-सुविधाओं का मोह है...
उसे सत्ता और सम्पत्ति के कारण मिलनेवाले अमर्याद भोगों का मोह है...
किंतु अर्जुन का मोह कितना अलग है, कितना निश्छल है ! 
जैसे छोटा बालक माँ के आँचल से बंधे रहने के मोह के कारण पाठशाला में ना जाने के लिए रोएं अथवा छोटीसी बालिका अपनी पुरानी, टूटीफूटी , मटमैली गुडिया को हृदय से लगाकर नई सुंदर सी गुडिया को नकार दे तो वह मोह कितना लुभावना लगता है !
पार्थ का मोह भी इतना ही कोमल है ! 
पार्थ क मोह तरल है , यह मोह मन को आलोकित करनेवाला है क्योंकि इसमें कोमल मानवीय भावनाओं की सुगंध है !
मनुष्य चाहे जितना ही समर्थ और कर्तृत्ववान क्यों ना हो किंतु फिर भी अपने आप को अपनों से जोडकर रख सकता है, उनके प्रेमरज्जु (धागा ) में स्वयं को बांधकर रखना चाहता है, वह अपनी क्षमता के बल पर सुख तक नहीं पाना चाहता क्योंकि उसे भय है कि इससे औरों का अहित ना हो , इस भावना का दर्शन ही कितना सुखद है !!!

और इन आश्वासक भावनाओं का साकार उदाहरण बने है अर्जुन !
विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर 'अपनों' पर बाण ना चलाने के लिए सबकुछ त्यागने को प्रस्तुत है..
---------------------------------------------------------
क्रमश :
---------------------------------------------------------

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१३

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४८

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०२