हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २२४

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। 
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥ ३४॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । 
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥३५॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
आजें  बाप मुले नातु आमुचे दिसती इथे।
सासरे मेहुणे मामे संबंधी आणि हे गुरु॥३४॥
न मारूं इच्छितो यांस मारितील जरी मज ।
विश्व - साम्राज्य सोडीन पृथ्वीचा पाड तो किती ॥३५॥
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युद्धक्षेत्र में खडे होकर अर्जुन कह रहे है कि 'मैं युद्ध नहीं कर सकता'।
कह रहे है वह श्रीकृष्ण से, किंतु कृष्ण ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। वह अर्जुन का विलाप स्वरूप कथन केवल सुन रहे है।
इन दोनोंका आपस का संबंध अत्यंत मनोज्ञ है, अति सुंदर !
श्रीकृष्ण और अर्जुन एकदूसरे के भ्राता है (अर्जुन की माता कुन्ती और श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव बहन भाई है )।
दोनो एक ही आयु के है (दूसरी दृष्टी से देखें तो युधिष्ठिर की आयु श्रीकृष्ण से अधिक है। किंतु वह भी श्रीकृष्ण को आदरणीय - वंदनीय - पूजनीय ही मानते है। पाण्डवों के स्वभाव में नम्रता और इतरों के लिए सम्मान तो है ही, साथ ही वह योग्यता को पहचानने कि क्षमता (ability to recognise / understand  and acknowledge greatness) भी रखते है !)।

श्रीकृष्ण और अर्जुन एक ही आयु के होने पर भी अर्जुन ने श्रीकृष्ण का सदैव सम्मान किया है, कभी उन्हे अपने समान ही मानकर व्यवहार नहीं किया। उनका संबंध मार्गदर्शक और शिष्य का रहा है (mentor - mentee)।
द्रौपदी विवाह के निर्णय में , खाण्डववन के दाह के प्रसंग में, सुभद्रा हरण के समय, कौरव पाण्डवों के युद्ध की स्थिति निर्माण होने पर... सभी समय  श्रीकृष्ण के प्रति पाण्डवों का 'प्रभु तुम ज्ञानी - मै अज्ञानी' यह भाव स्पष्ट है।

मनुष्य को मनुष्यत्व से संतत्व के मार्ग की ओर और वहाँ से देवत्व के परम उद्देश तक ले जाने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण बात मानी गई हैं 'गुरु का मार्गदर्शन'। और पाण्डवों ने श्रीकृष्ण में गुरु को देखा है इसलिए पाया भी है।
अच्छा बनने की, धर्मपालन और धर्मरक्षा करने की और इस मार्ग से स्वयं की आत्मिक उन्नति करने की इच्छा जो रखतें है, प्रभु उनके पास स्वयं चलकर आतें है इसका यह साकार उदाहरण है !
आधुनिक काल के अनेक संत और योगीयों के चरित्र में भी यह पाया जाता है कि उनके गुरु या तो स्वयं उन्हे लेने आ गए थे अथवा गुरु ने उन्हे आमंत्रण का संदेश भेजा था।

और आधुनिक युग में जहाँ अनेक व्यक्ति पैसा, प्रसिद्धी और सत्ता के मोह में अपना मार्ग निश्चित करने में चूक जाते है अथवा तथाकथित (illusional) प्रगति के लिए गलत मार्गदशक चुन लेते है ऐसे में अर्जुन से हम सीख ले सकते है कि मार्गदर्शक चुनने में बुद्धिमत्ता का कितना महत्व है।

इसी महाभारत में दुर्योधन भी तो है जिसने कर्ण और शकुनि को अपना हितैषी माना और युद्ध के लिए कृष्ण के बदले नारायणी सेना पाकर आनंदित हुआ।
दुर्योधन यह 'विनाशकाले विपरीत बुद्धी (जब नाश निश्चित हो तब कुबुद्धी ही मार्ग दिखाती है) इसका साक्षात उदाहरण है !

तो अर्जुन ! 
अब उन्हे युद्धसज्ज खडे अपने परिजन दिखाई दे रहें है। इनमें आयु में छोटे - बडे सब है। अर्जुन ने इन सब बडों को सदैव प्रणाम किया है, उनका सम्मान और भक्ति की है। वहीं आयु में छोटे परिजनों के लिए उनके मन में प्रेम और वात्सल्य का भाव है। और उनसे युद्ध करने का अर्थ है कभी भी उनपर शस्त्र चलाने का समय आ सकता है।
अर्जुन का धैर्य चुकने लगा है। वह अब कृष्ण से कह रहें है कि 'यह सब मुझे मारना चाहे तो मार सकते है किंतु मेरी इच्छा नहीं है इनपर शस्त्र चलाने की। क्योंकि इन्हे मारकर मुझे यदि सारे विश्व का साम्राज्य मिल जाए तब भी मुझे नहीं चाहिए तो पृथ्वी पर राज्य मिलना ऐसी कौनसी बडी बात है ! नहीं चाहिए ऐसा राज्य जिसका मूल्य मेरे सगसंबंधियों का प्राण हरण करना हो !'
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क्रमश :
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