हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २२७

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः 
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।।३९।।
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गीताई ( मराठी अनुवाद  : आचार्य विनोबा भावे )
परी हें पाप टाळावें आम्हा का समजूं नयें।
कुल-क्षयी  महा-दोष कृष्णा उघड पाहतां ॥३९॥
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अर्जुन कह रहें है कि 'कौरवों की बुद्धी और मति (इच्छा/ वृत्ति /स्वभाव) लोभ के कारण इतनी छलनी हो गई है कि वह अपनी वाणी और कृति में जो पाप है उसे भी नहीं देख पा रहें है और अनाचार - अत्याचार - अधर्म करते जा रहें है। परंतु यदि हम पाण्डव पाप की व्याख्या और उसकी व्याप्ति (definition & spread of misdeeds/sins) समझ रहें है तो पाप को टालने का प्रयत्न हम क्यों ना करें ? 
हम क्यो अपने ही कुल के संबंधी अर्थात वयोवृद्ध पितामह , भ्राता , पुत्र - पौत्र , हमारे गुरुबंधु , मित्र आदि से युद्ध करने का पाप करे ? 
अपने ही वंश का नाश करना महापाप है तो हम उसे क्यों करे ? 
केवल इसलिए की कौरवों ने हमसे शत्रुता पाल कर युद्ध का निर्णय लिया है ? '

अर्जुन का भाव यह है कि यदि सामनेवाले ने भूल / पाप किया हो तो क्या उसका वैसा ही प्रतिउत्तर देना आवश्यक है ? 
हम भी तो पीछे हटने की पहल कर सकते है, उन्हे उनकी इच्छा के अनुसार सुख पा लेने दे और हम उस सुख को पाने की इच्छा त्याग दे यह भी तो उपाय हो सकता है।

अर्जुन के इन प्रश्नों पर, उनकी इस हताशा और निराशा पर श्रीकृष्ण का उपदेश यहीं भगवद्गीता का महत्वपूर्ण भाग है। किंतु, अभी हम यहाँ क्षणभर रुककर यदि अर्जुन की बात पर विचार करेंगे तो कदाचित हमारा लाभ ही होगा। 

कहते है कि भगवद्गीता जीवन के प्रत्येक प्रसंग में मार्गदर्शक होती है। इस बात में भी मार्गदर्शन का एक सूत्र है। अर्जुन कह रहें है कि कौरव भूल कर रहें है , वह जो कर रहें है वह पाप है , किंतु हम तो विचारी है , तब हम क्यों उनके जैसे पाप के मार्ग पर जाएं? हम अपनी इच्छाओं को थोडा मोड दें अथवा उन्हे छोड पाएं तो हमें कौरवों पर विजय प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहेगी और हम पाप करने से बच पाएंगे।

हमारे लिए यह एक सीख हो सकती है। क्योंकि , अनेकों बार विशिष्ट सुख प्राप्त ना होना यह वास्तव में समस्या होती ही नहीं है। मूल समस्या यह होती है कि मनुष्य इच्छा करता है, अपेक्षा रखता और उस इच्छा /अपेक्षा के पूर्ण ना होनेपर वह दुखी  अथवा क्रोधित होता है। तो समस्या का मूल 'विशिष्ट सुख ना पाना' है ही नही, मूल कारण होता है हमारी अपनी इच्छा ! 

यदि विशिष्ट वस्तु अथवा विशिष्ट सुख पाने की इच्छा मन में उत्पन्न ही ना हो तो वास्तव में जो मिलेगा वहीं एक 'बोनस' के समान होगा और हम हताशा - निराशा - क्रोध - द्वेष - ईर्ष्या आदि से बच पाएंगे।
प्रथमतः यह असंभव लगेगा किंतु अनजाने में हम यह अनेक स्थितियों में करते रहते है। इसे यदि हम अपनी विचारधारा में परिवर्तन कर करेंगे तो सुख ही पाएंगे।

उदाहरण के लिए हमारे मित्रपरिवार में कुछ लोग यदि अत्यंत धनी है और विदेशयात्रा करते रहते है तो हमारे मन में भी इच्छा हो सकती है कि 'मुझे भी विदेश जाना है।'
यदि उतना धन ना हो तो विदेशयात्रा नहीं हो पाएगी। इससे दुख होगा और बढता भी रहेगा।
परंतु यदि हम अपने ही देश के किसी पर्यटन स्थल पर  जाते है और साथ में हमारा कुटुंब हो, मित्र हो तो आनंद मिलेगा ही !

ऐसे में हम विचार कर सकते है कि मूल इच्छा क्या थी, विश्राम करने की, आनंद पाने की और परिजनों के साथ समय बिताने की अथवा विदेश जाने की?
आनंद विदेश जाने में ही क्यों है ?
अपनों के साथ बिताया गया समय भी तो आनंद ही है!

इस दृष्टी से आज की अर्जुन की बात हम साधारण मनुष्यों के लिए अवश्य विचारणीय हो सकती है !
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क्रमश :
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