हिंदु धर्मसंस्कार🚩 : भाग २३०

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
...........................................................
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । 
पतन्ति पितरो ह्येषां  लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥४२॥
...........................................................
गीताई  ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
संकरे नरका जाय कुलघ्नांसह ते कुळ।
पितरांचा अधपात होतस श्राद्ध लोपुनि॥४२॥
............................................................
 अध्याय १ : श्लोक ४२ : भाग १

वर्णसंकर के कारण होनेवाली सामाजिक और पारिवारिक हानि से अर्जुन चिंतित है।
यहाँ 'वर्ण' का अर्थ समझना आवश्यक है। क्योंकि इसका अर्थ समझनेपर ही हम सनातनी हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था समझ पाएंगे।

मान्यता है कि वर्णव्यवस्था श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित की गई है। इस व्यवस्था में चार वर्ण बनाए गए है -
एक वर्ण ब्राह्मणों का है। यह वर्ण ज्ञान प्राप्त कर समाज का मार्गदर्शन करें यह अपेक्षा है। इनमें से ही विधिवत् शिक्षा (education) देनेवाले गुरु भी होते थे। 
एक वर्ण क्षत्रियों का है। मानव जब अपने अपने समुदाय बनाने लगे तब अन्य विविध कारणों से अन्य समुदायों द्वारा आक्रमण की संभावनाएं भी बढने लगी। अनेक समुदायों का मिलकर राज्य बननेपर दूसरे राज्यों द्वारा आक्रमण की संभावना भी होती है । ऐसे में शत्रु से संरक्षण करने के लिए शूर योध्दा , सेनानी आदि आवश्यक होंगे जो क्षत्रिय वर्ण से होते थे।

एक और वर्ण होता है वैश्य अर्थात व्यापारी। मानव जब गुफा आश्रय छोडकर और शिकार द्वारा क्षुधाशांति (अन्न की व्यवस्था) से आगे बढकर खेती करने लगा तब उसकी आवश्यकताएं बढने लगी। अन्न - वस्त्र - निवास इन मूलभूत आवश्यकताओं के साथ साथ उसे अन्य वस्तुओं की भी आवश्यकता होने लगी। व्यापारी वर्ग इन आवश्यकताओं को पूर्ण करता है। 
इन व्यापारियों में उत्पादक और विक्रेता दोनों ही हो सकतें है। कुछ होंगे जो वस्तुओं का उत्पादन कर उसकी विक्री करेंगे जैसे किसान , सुनार , लुहार आदि। केवल विक्रेता वह होंगे जो उत्पादकों से वस्तु क्रय करेंगे और उनका विक्रय करेंगे जैसे परचून की दुकान (grocery shop)। 

एक और वर्ग है शूद्रों का। किसी भी समाज को सुव्यवस्थित रूप से चलने के लिए श्रमजीवी वर्ग की भी आवश्यकता होती है। इस वर्ग के लोग शारिरीक कष्ट का काम करते है जैसे सामान ढो कर दूसरें स्थानों पर ले जाना, स्वच्छता करने संबंधी काम, मांसाहारी समाज के लिए पशुओं को मारकर मांस बेचने का काम, शमशान में मृतदेहों का अंत्यसंस्कार करने का काम, आदि।

वर्णों को लेकर अनेक भ्रांतियाँ पायी जाती है क्योंकि आधुनिक काल में वर्ण और जाति को एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द (synonyms) समझकर अनेक भ्रम (misconceptions ) पाले जा रहें है। किंतु वर्ण का अर्थ जाति नहीं है। वर्ण यह एक व्यापक संकल्पना है (broad term)। इसके अंतर्गत समाज को सुचारू रूप से चलने के लिए गुट (group) जैसी व्यवस्था बनाई गयी है।
इसपर थोडा अधिक विचार करने पर हम अर्जुन की चिंता समझ पाएंगे ।
...........................................................
 अध्याय १ : श्लोक ४२ - भाग २:  क्रमश :
...........................................................

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१३

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४८

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०२